एकाम्र क्षेत्र, पुराना भुवनेश्वर, ओडिशा
तेरह मीटर का वह मंदिर, जहाँ से कोणार्क तक का रास्ता शुरू हुआ
लिंगराज के विशाल शिखर से कुछ ही दूरी पर एक छोटा-सा बलुआ पत्थर का मंदिर खड़ा है, जिसे अधिकांश पर्यटक जल्दी में पार कर जाते हैं। पर कलिंग वास्तुकला की कहानी पढ़नी हो, तो पहला पन्ना यहीं खुलता है।
भुवनेश्वर को "मंदिरों का नगर" कहा जाता है, और इसकी पहचान है लिंगराज का आकाश छूता शिखर। पर इसी पुराने नगर में, एक शांत कोने में, घास के लॉन के बीच एक मंदिर है जिसकी ऊँचाई लगभग तेरह मीटर है — यानी लिंगराज की ऊँचाई का एक छोटा-सा हिस्सा। यह है परशुरामेश्वर मंदिर। पहली नज़र में इसमें ऐसा कुछ नहीं लगता जो इसे ख़ास बनाए। फिर भी इतिहासकार और वास्तुविद इसे ओडिशा की मंदिर-वास्तुकला की "शुरुआत" के रूप में देखते हैं।
ऐसा क्यों? एक छोटा मंदिर इतनी बड़ी परंपरा का आरंभ-बिंदु कैसे बन गया — वह परंपरा जो आगे चलकर लिंगराज, पुरी के जगन्नाथ और कोणार्क के सूर्य मंदिर तक पहुँची? इस लेख में हम परशुरामेश्वर मंदिर को एक पत्थर की वर्णमाला की तरह पढ़ेंगे। जैसे किसी भाषा के महान महाकाव्य उसकी वर्णमाला के कुछ अक्षरों से बनते हैं, वैसे ही कलिंग शैली के भव्य मंदिरों की "वर्णमाला" के कई अक्षर पहली बार इसी मंदिर में स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं।
"हज़ार मील की यात्रा भी एक कदम से शुरू होती है।"
लाओ त्ज़ु, ताओ ते चिंगपहले एक भ्रम दूर कर लें: "पहला" का अर्थ क्या है?
किसी भी प्राचीन मंदिर के बारे में "सबसे पहला" कहना जोखिम भरा होता है, और परशुरामेश्वर के साथ भी यही बात है। इसलिए सबसे पहले यह स्पष्ट करना ज़रूरी है कि इस मंदिर को किस अर्थ में "शुरुआत" कहा जाता है।
क्या यह भुवनेश्वर का सबसे पुराना मंदिर है?
ज़रूरी नहीं। भुवनेश्वर में शत्रुघ्नेश्वर, भरतेश्वर और लक्ष्मणेश्वर नाम के तीन छोटे मंदिरों का समूह भी है, जिन्हें कई विद्वान परशुरामेश्वर जितना या उससे थोड़ा पुराना मानते हैं। कुछ इतिहासकार परशुरामेश्वर को आठवीं सदी के आरंभ का भी बताते हैं। तिथि पर बहस है, पर अधिकतर विद्वान शैली के आधार पर सातवीं सदी के मध्य (लगभग 650 ई.) की तिथि स्वीकार करते हैं, जिसे प्रसिद्ध इतिहासकार के. सी. पाणिग्रही ने प्रस्तावित किया था।
तो फिर विशेषता क्या है? परशुरामेश्वर को प्रारंभिक कलिंग शैली का सबसे अच्छी तरह संरक्षित उदाहरण माना जाता है। यानी इस काल के मंदिरों में यह अकेला है जो लगभग अपने पूरे रूप में बचा है, और जिसमें उस प्रारंभिक शैली की सभी मुख्य विशेषताएँ एक साथ देखी जा सकती हैं। साथ ही कुछ तत्व ओडिशा के मंदिरों में पहली बार यहीं दिखाई देते हैं।
इसे ऐसे समझिए: अगर किसी भाषा की सबसे पुरानी पांडुलिपियाँ फटी-पुरानी हों और एक पांडुलिपि लगभग पूरी बची हो, तो विद्वान उसी पूरी पांडुलिपि से भाषा के प्रारंभिक रूप को समझते हैं। परशुरामेश्वर कलिंग वास्तुकला की वही "पूरी पांडुलिपि" है।
पत्थर की वर्णमाला: रेखा देउल का शरीर
परशुरामेश्वर को समझने के लिए पहले ओडिशा के मंदिर की "शब्दावली" समझनी होगी। कलिंग शैली के मंदिर में मुख्यतः दो भाग होते हैं: देउल (या विमान), जिसके भीतर गर्भगृह होता है, और जगमोहन, यानी सामने का सभा-कक्ष जहाँ भक्त एकत्र होते हैं। बाद के बड़े मंदिरों में इनमें नाट मंडप और भोग मंडप भी जुड़ गए।
गर्भगृह के ऊपर उठने वाले वक्ररेखीय शिखर वाले देउल को रेखा देउल कहते हैं। इसके शरीर के हर भाग का अपना नाम है, जैसे मनुष्य के शरीर के अंगों का। परशुरामेश्वर इसी रेखा देउल का प्रारंभिक, सुगठित रूप है:
- आयुध और कलश — सबसे ऊपर; शिव मंदिर में प्रायः त्रिशूल जैसा आयुध, नीचे पवित्र कलश
- आमलक — आँवले के आकार का गोल, धारीदार पत्थर, जो शिखर का मुकुट है
- बेकी — शिखर और आमलक के बीच की "गर्दन"
- गंडी — वक्ररेखीय उठता हुआ शिखर, मंदिर का धड़
- बाड़ (बरंड, जंघा, पाभाग) — दीवार वाला निचला भाग: ऊपर की पट्टी, बीच की दीवार और आधार की सजी हुई पट्टियाँ
- रथ / पग — दीवार के ऊर्ध्वाधर उभार; तीन उभार = त्रिरथ, पाँच = पंचरथ
परशुरामेश्वर का देउल लगभग 13 मीटर ऊँचा है, बिना किसी ऊँचे चबूतरे के खड़ा है, और योजना में त्रिरथ है — यानी उसकी हर दीवार पर तीन ऊर्ध्वाधर उभार हैं। प्रारंभिक काल की यही प्रमुख शैली थी। बाद के मंदिरों में ये उभार बढ़कर पंचरथ और उससे भी अधिक हो गए, जिससे शिखर अधिक जटिल, गतिशील और ऊँचे दिखने लगे। यानी जो रेखाएँ लिंगराज और कोणार्क में भव्य रूप से फैलती हैं, उनकी शुरुआती "लिखावट" यहाँ सरल और स्पष्ट दिखती है।
यही वक्ररेखीय शिखर उत्तर भारत की नागर शैली का भी आधार है, जिसकी एक शाखा हमने बंगाल के इछाई घोष के ईंटों वाले देउल में देखी थी और एक अनोखा रूप कानपुर के स्तूप-जैसे जगन्नाथ मंदिर में। कलिंग शैली इसी विशाल नागर परिवार की एक विशिष्ट, अत्यंत परिष्कृत क्षेत्रीय शाखा है।
पाँच कारण, जिनसे यह छोटा मंदिर "शुरुआत" बन गया
अब मुख्य प्रश्न पर आते हैं। वे कौन-सी विशेषताएँ हैं जिनके कारण परशुरामेश्वर को ओडिशा की मंदिर-वास्तुकला के विकास का आरंभ-बिंदु माना जाता है? नीचे के पाँच कारण किसी क्रम में नहीं, बल्कि पाँच अलग-अलग "अक्षरों" की तरह हैं जो इस मंदिर ने कलिंग वर्णमाला को दिए।
गर्भगृह से जुड़ा पहला जगमोहन
ओडिशा पर्यटन के अनुसार परशुरामेश्वर वह पहला मंदिर माना जाता है जिसमें गर्भगृह के साथ जगमोहन (प्रवेश-कक्ष) जोड़ा गया। देउल और जगमोहन की यह जोड़ी आगे चलकर हर बड़े कलिंग मंदिर की पहचान बन गई। लिंगराज, जगन्नाथ और कोणार्क — तीनों में यही मूल संरचना है, बस अधिक भव्य और विस्तृत रूप में। अगर कलिंग मंदिर एक वाक्य है, तो "देउल + जगमोहन" उसका कर्ता और क्रिया है, और यह वाक्य पहली बार इतनी स्पष्टता से यहीं लिखा गया।
त्रिरथ रेखा देउल का आदर्श नमूना
परशुरामेश्वर के देउल में प्रारंभिक कलिंग शैली की सभी मुख्य विशेषताएँ मौजूद हैं — त्रिरथ योजना, वक्ररेखीय गंडी, शिखर पर आमलक, और दीवारों पर व्यवस्थित सजावट। विवरणों के अनुसार इसकी सजावट-योजना प्राचीन वास्तुशास्त्रीय ग्रंथों के नियमों का बारीकी से पालन करती है। यही कारण है कि वास्तुकला के विद्यार्थी कलिंग शैली की "व्याकरण" सीखने के लिए इसी मंदिर से शुरुआत करते हैं।
सप्तमातृकाओं की पहली उपस्थिति
यह शिव मंदिर है, फिर भी इसकी दीवार पर शक्ति की सात रूपों वाली सप्तमातृकाएँ — ब्राह्मी, माहेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही, इंद्राणी और चामुंडा — अंकित हैं, जिनके दोनों ओर गणेश और वीरभद्र हैं। भुवनेश्वर के मंदिरों में सप्तमातृकाओं का यह पहला ज्ञात चित्रण माना जाता है। शैव मंदिर में शाक्त देवियों का यह समावेश ओडिशा की उस समन्वयकारी धार्मिक संस्कृति का प्रारंभिक प्रमाण है, जो आगे चलकर हीरापुर के चौसठ योगिनी मंदिर जैसे अद्भुत शाक्त स्थलों तक पहुँची।
आठ ग्रह — तिथि का एक सूक्ष्म सुराग
गर्भगृह के द्वार के ऊपर ग्रहों की पट्टी है, और रोचक बात यह है कि इसमें नौ नहीं, आठ ग्रह अंकित बताए जाते हैं। बाद के कलिंग मंदिरों में नवग्रह, यानी नौ ग्रह, दिखाई देते हैं। विद्वानों के अनुसार आठ ग्रहों की यह उपस्थिति भी इस मंदिर की प्रारंभिक तिथि का एक संकेत है, क्योंकि केतु को अलग ग्रह के रूप में मूर्तियों में शामिल करने की परंपरा इस क्षेत्र में बाद में स्थिर हुई। नवग्रहों की पूरी परंपरा और उनके मंदिरों पर हमारा लेख नवग्रह दरबार इस सुराग को और रोचक बना देता है।
पाशुपत संप्रदाय का पत्थर में लिखा इतिहास
मंदिर पर बार-बार लकुलीश की प्रतिमाएँ दिखाई देती हैं — पाशुपत शैव संप्रदाय के प्रवर्तक माने जाने वाले आचार्य। एक स्थान पर वे अपने चार शिष्यों के साथ हैं, और एक अन्य स्थान पर नटराज की आकृति के ऊपर ध्यानस्थ मुद्रा में, बुद्ध जैसी शैली में। यह मंदिर उस काल का दस्तावेज़ है जब ओडिशा में पाशुपत शैव धारा प्रभावशाली थी, और जब बौद्ध कला की शैलियाँ हिंदू मूर्तिकला में घुल-मिल रही थीं। इतिहास की यह परत किसी शिलालेख से कम मूल्यवान नहीं।
"स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात्।"
श्रीमद्भगवद्गीता 2.40 — इस धर्म का थोड़ा-सा आचरण भी बड़े भय से रक्षा करता हैजो प्रयोग आगे नहीं चले: एक ईमानदार "शुरुआत"
हर शुरुआत में कुछ प्रयोग ऐसे होते हैं जो आगे नहीं बढ़ते, और परशुरामेश्वर इसका सुंदर उदाहरण है। इसका जगमोहन आयताकार है, और उसकी छत दो स्तरों में ढलवाँ है, जिनके बीच प्रकाश आने के लिए खुली जगह (क्लेरेस्टोरी) है। छत को भीतर से छह स्तंभ सहारा देते हैं, दो पंक्तियों में तीन-तीन। जगमोहन में पश्चिम और दक्षिण में दो दरवाज़े हैं, और पत्थर की जालीदार खिड़कियाँ, जिनसे भीतर पर्याप्त रोशनी आती है।
यह डिज़ाइन व्यावहारिक और सुंदर था, फिर भी आगे के कलिंग मंदिरों में इसे नहीं अपनाया गया। बाद में जगमोहन वर्गाकार हो गया और उसकी छत पीढ़ा शैली की बनी — यानी एक के ऊपर एक घटती हुई क्षैतिज परतें, जो दूर से पिरामिड जैसी दिखती हैं। इस पीढ़ा शैली वाले जगमोहन को पीढ़ा देउल कहा जाता है, और रेखा देउल के साथ उसकी जोड़ी कलिंग वास्तुकला की परिपक्व पहचान बन गई।
कुछ विद्वानों का यह भी मत है कि परशुरामेश्वर का जगमोहन मुख्य देउल के साथ पूरी तरह सहज रूप से नहीं जुड़ता, मानो दोनों भागों को जोड़ने की कला अभी सीखी जा रही हो। यही इस मंदिर की सबसे मानवीय बात है: यहाँ आप एक परंपरा को बनते हुए देखते हैं, उसके संकोच, प्रयोग और खोज के साथ। इसलिए इसे "शुरुआत" कहना केवल समय की बात नहीं, बल्कि सीखने की प्रक्रिया की बात भी है।
वास्तुकला के विद्यार्थियों के लिए एक तुलना: परशुरामेश्वर (सातवीं सदी) के आयताकार, ढलवाँ छत वाले जगमोहन को देखने के बाद पास के मुक्तेश्वर मंदिर (लगभग दसवीं सदी) का वर्गाकार, पीढ़ा छत वाला जगमोहन देखिए। दोनों के बीच की लगभग तीन शताब्दियों में कलिंग वास्तुकारों ने जो सीखा, वह आपकी आँखों के सामने होगा।
बीज से वटवृक्ष तक: कलिंग शैली का विकास
परशुरामेश्वर को "शुरुआत" कहने का सबसे अच्छा प्रमाण यह देखना है कि यह परंपरा आगे कहाँ तक गई। नीचे भुवनेश्वर और ओडिशा के कुछ प्रमुख मंदिरों की अनुमानित ऊँचाई के आधार पर एक तुलना है। ध्यान दीजिए कि विकास केवल ऊँचाई में नहीं, बल्कि योजना, सजावट और संरचनाओं की संख्या में भी हुआ।
सभी ऊँचाइयाँ अनुमानित हैं और स्रोतों में अंतर मिलता है। कोणार्क का मुख्य देउल अब नहीं बचा; उसकी ऊँचाई केवल विद्वानों का अनुमान है, इसलिए उसे धारीदार दिखाया गया है।
इस चित्र में एक रोचक बात छिपी है: मुक्तेश्वर परशुरामेश्वर से भी छोटा है, फिर भी उसे कलिंग वास्तुकला का "रत्न" कहा जाता है। यानी विकास का अर्थ हमेशा बड़ा होना नहीं था — कभी-कभी उसका अर्थ था अधिक परिष्कृत होना। परशुरामेश्वर से लिंगराज तक की यात्रा ऊँचाई की भी है और सूक्ष्मता की भी।
पाँच पड़ाव, एक परंपरा
| काल | मंदिर / चरण | क्या नया जुड़ा |
|---|---|---|
| 7वीं सदी | परशुरामेश्वर (शैलोद्भव काल) | त्रिरथ रेखा देउल के साथ जुड़ा आयताकार जगमोहन; सप्तमातृकाएँ; अष्टग्रह |
| 8वीं सदी | वैताल देउल (भौमकर काल) | खाखरा शैली की आयताकार, ढोलक जैसी छत; उग्र शाक्त मूर्तियाँ |
| लगभग 10वीं सदी | मुक्तेश्वर (सोमवंशी काल) | पीढ़ा छत वाला वर्गाकार जगमोहन; प्रसिद्ध मेहराबदार तोरण; अत्यंत परिष्कृत नक्काशी |
| लगभग 11वीं सदी | राजारानी और लिंगराज | पंचरथ और उससे जटिल योजनाएँ; अंगशिखर; लिंगराज में देउल, जगमोहन, नाट मंडप और भोग मंडप — चारों संरचनाएँ |
| 12वीं–13वीं सदी | जगन्नाथ, पुरी और कोणार्क (गंग काल) | विशाल पैमाना; कोणार्क में पूरा मंदिर सूर्य के रथ के रूप में — कलिंग शैली का शिखर |
ध्यान देने वाली बात यह है कि कलिंग वास्तुकला की तीन मुख्य देउल-शैलियाँ मानी जाती हैं — रेखा, पीढ़ा और खाखरा। परशुरामेश्वर रेखा शैली का प्रारंभिक नमूना है, उसका जगमोहन एक प्रयोगात्मक रूप है, और पास का वैताल देउल खाखरा शैली का उदाहरण है। यानी पुराने भुवनेश्वर के एक छोटे-से क्षेत्र में आप पूरी वर्णमाला के अक्षर एक साथ देख सकते हैं।
"यहाँ पत्थर की भाषा मनुष्य की भाषा से आगे निकल जाती है।"
रवींद्रनाथ टैगोर (कोणार्क के बारे में प्रचलित कथन)टैगोर ने जिस कोणार्क की प्रशंसा में ये शब्द कहे, उसकी पत्थर की भाषा की वर्णमाला लगभग छह सौ वर्ष पहले परशुरामेश्वर में सीखी जा रही थी। यही इस छोटे मंदिर का सबसे बड़ा महत्व है।
नाम की कथा: परशुराम की तपस्या
मंदिर का नाम भगवान परशुराम से जुड़ा है। भुवनेश्वर की परंपरा के अनुसार यह नाम परशुराम की तपस्या और उस पर भगवान शिव की कृपा से पड़ा। परशुराम, जिन्हें भगवान विष्णु का छठा अवतार माना जाता है, स्वयं महान शिवभक्त थे — परंपरा कहती है कि उनका प्रसिद्ध परशु (फरसा) उन्हें शिव से ही प्राप्त हुआ था। परशुराम अवतार की पूरी कथा और दशावतारों में उनका स्थान आप हमारे लेख दशावतार: विष्णु के 10 अवतार और उनका विकासक्रम में पढ़ सकते हैं।
एक दूसरी व्याख्या भी मिलती है। कुछ विवरणों के अनुसार मंदिर पहले "परशवर" या उससे मिलते-जुलते नाम से जाना जाता था, जिसका संबंध लकुलीश की पाशुपत परंपरा के एक आचार्य से जोड़ा जाता है। मंदिर पर लकुलीश की बार-बार उपस्थिति इस व्याख्या को रोचक बनाती है। समय के साथ, संभवतः लोक-उच्चारण में, यह नाम "परशुरामेश्वर" बन गया हो — पर यह भी एक मत ही है।
परशुराम अष्टमी: जब लिंगराज के प्रतिनिधि मिलने आते हैं
मंदिर का प्रमुख उत्सव परशुराम अष्टमी है। इस दिन लिंगराज मंदिर के प्रतिनिधि देवता चंद्रशेखर शोभायात्रा में परशुरामेश्वर मंदिर आते हैं, और भोज का आयोजन होता है। यह सुंदर परंपरा बताती है कि पुराने भुवनेश्वर के मंदिर अलग-अलग इमारतें नहीं, बल्कि एक जीवित पवित्र परिवार हैं — जहाँ विशाल लिंगराज भी हर साल इस छोटे, प्राचीन मंदिर का सम्मान करने आता है।
दीवारों पर क्या देखें: एक मूर्ति-यात्रा
परशुरामेश्वर की मूर्तियाँ बाद के मंदिरों की तुलना में अपेक्षाकृत सपाट और कठोर मानी जाती हैं — और यही उनकी प्राचीनता का एक संकेत है। पर इनमें जो कथा-शक्ति और जीवंतता है, वह आपको हैरान कर देगी। मंदिर की परिक्रमा करते समय इन पर विशेष ध्यान दीजिए:
लकुलीश और उनके चार शिष्य
शिखर के एक ओर के मेडलियन में लकुलीश चार शिष्यों के साथ, और उसके ऊपर उमा-महेश्वर। बुद्ध जैसी ध्यान-मुद्रा पर ध्यान दें।
नटराज
पश्चिम की ओर नृत्य करते शिव का अंकन, जिसके ऊपर ध्यानस्थ लकुलीश हैं — गति और स्थिरता का एक सुंदर संवाद।
सप्तमातृकाएँ, गणेश और वीरभद्र
जगमोहन की पश्चिमी दीवार पर सात देवियाँ, दोनों ओर गणेश और वीरभद्र। भुवनेश्वर में इस समूह का पहला ज्ञात चित्रण।
जंगली हाथियों को पकड़ने का दृश्य
जगमोहन के मुख्य द्वार के पास पालतू हाथियों द्वारा जंगली हाथियों को पकड़ने की नक्काशी — उस युग के जीवन की एक दुर्लभ झलक।
जालीदार खिड़कियों पर नर्तक और वादक
पश्चिमी खिड़कियों पर नर्तकों और संगीतकारों की जीवंत पट्टियाँ। विद्वान इन्हें उस काल की मंदिर-संगीत और नृत्य परंपरा का प्रमाण मानते हैं।
अष्टग्रह और द्वार-अलंकरण
गर्भगृह के द्वार के ऊपर आठ ग्रहों की पट्टी। द्वार की चौखट पर अलंकरण, और भीतर अंधेरे में छिपा एक शिलालेख, जो लंबे समय तक विद्वानों की नज़र से बचा रहा।
उस शिलालेख की कहानी भी रोचक है। गर्भगृह के भीतर अंधेरे के कारण एक द्वार-शिलालेख लंबे समय तक ध्यान में नहीं आया। जब उसका अध्ययन हुआ, तो विद्वानों में उसकी तिथि पर भी मतभेद रहा — एक मत ने उसे आठवीं सदी से पहले का नहीं माना, जबकि के. सी. पाणिग्रही ने उसकी लिपि की तुलना शैलोद्भव राजा माधवराज द्वितीय के ताम्रपत्र से करके उसे सातवीं सदी का बताया। यानी इस छोटे मंदिर की तिथि का प्रश्न आज भी विद्वानों के लिए जीवित है।
"रूप कार्य का अनुसरण करता है।"
लुई सुलिवन, आधुनिक वास्तुकला के अग्रदूतशैलोद्भव और एकाम्र क्षेत्र: वह संसार जिसमें यह मंदिर बना
परशुरामेश्वर को समझने के लिए उस समय को भी समझना होगा। सातवीं सदी में ओडिशा के इस भाग पर शैलोद्भव राजवंश का शासन था। परंपरा के अनुसार यह मंदिर इसी वंश के राजा माधवराज द्वितीय के समय बना, जो शिव के उपासक थे। यही वह काल था जब प्राचीन एकाम्र क्षेत्र, यानी आज का पुराना भुवनेश्वर, पहली बार बड़े पैमाने पर मंदिर-निर्माण का केंद्र बनने लगा।
"एकाम्र" नाम एक आम्र (आम) वृक्ष से जुड़ा है, और यह क्षेत्र शिव का पवित्र क्षेत्र माना जाता है। अगले छह सौ वर्षों में यहाँ सैकड़ों मंदिर बने, और भुवनेश्वर को "मंदिरों का नगर" कहलाने का गौरव मिला। ये मंदिर किसी एक राजवंश के नहीं थे — शैलोद्भव, भौमकर, सोमवंशी और गंग राजवंशों ने बारी-बारी से इस परंपरा को आगे बढ़ाया। पर इस लंबी शृंखला की पहली मज़बूत कड़ी परशुरामेश्वर ही है।
ज्योतिर्लिंगों जैसे विशाल शिव तीर्थों की तुलना में परशुरामेश्वर बहुत छोटा है, पर शिव-उपासना की स्थापत्य-परंपरा को समझने में उसका योगदान उतना ही बड़ा है। भारत के प्रमुख शिव तीर्थों के बारे में हमारी 12 ज्योतिर्लिंगों की संपूर्ण जानकारी वाली गाइड इस व्यापक परंपरा का परिचय देती है।
भारत की अन्य शैलियों के साथ रखकर देखें
कलिंग शैली का महत्व तब और साफ़ होता है जब हम उसे भारत की दूसरी स्थापत्य-परंपराओं के साथ रखकर देखते हैं। गुजरात के सोमनाथ मंदिर का वर्तमान भवन पश्चिम भारत की चालुक्य (मारु-गुर्जर) शैली की याद दिलाता है, जहाँ शिखर के चारों ओर छोटे-छोटे उपशिखरों का समूह उभरता है। मध्य प्रदेश का मितावली का गोल मंदिर बताता है कि भारत में मंदिर हमेशा ऊँचे शिखर वाले ही नहीं बने — कुछ खुले आकाश के नीचे, वृत्ताकार रूप में भी बने। इन सबके बीच कलिंग शैली की पहचान है उसका स्पष्ट, संतुलित ढाँचा: एक रेखा देउल, उसके सामने एक जगमोहन, और दोनों की दीवारों पर कथा कहती मूर्तियाँ। परशुरामेश्वर इसी पहचान का पहला पूर्ण रूप है।
मंदिर की दीवारों पर दिखने वाले शिव, गणेश, कार्तिकेय, सप्तमातृकाओं और नवग्रहों जैसे देवताओं को पहचानना सीखना हो, तो हमारी हिंदू देवी-देवताओं की संपूर्ण गाइड एक उपयोगी साथी है। और भारत के प्रमुख तीर्थों की विस्तृत यात्रा-जानकारी के लिए हमारी टेंपल गाइड्स श्रृंखला देखिए।
लोग यह भी पूछते हैं
परशुरामेश्वर मंदिर किसने बनवाया?
यह मंदिर सातवीं सदी में शैलोद्भव राजवंश के काल में बना। परंपरा इसे राजा माधवराज द्वितीय के समय से जोड़ती है।
परशुरामेश्वर मंदिर किस शैली में बना है?
यह नागर परिवार की कलिंग शैली में बना है। इसका देउल त्रिरथ योजना वाला रेखा देउल है, और जगमोहन आयताकार, दो-स्तरीय ढलवाँ छत वाला है।
परशुरामेश्वर मंदिर की ऊँचाई कितनी है?
इसका देउल लगभग 13 मीटर ऊँचा है और बिना ऊँचे चबूतरे के खड़ा है।
भुवनेश्वर का सबसे पुराना मंदिर कौन-सा है?
शत्रुघ्नेश्वर समूह और परशुरामेश्वर को भुवनेश्वर के सबसे पुराने मंदिरों में गिना जाता है। परशुरामेश्वर इनमें सबसे अच्छी तरह संरक्षित है।
कलिंग वास्तुकला की तीन शैलियाँ कौन-सी हैं?
रेखा देउल (वक्ररेखीय शिखर), पीढ़ा देउल (परतदार पिरामिड जैसी छत) और खाखरा देउल (आयताकार, ढोलक जैसी छत)।
परशुरामेश्वर मंदिर में किस देवता की पूजा होती है?
यहाँ भगवान शिव की पूजा परशुरामेश्वर के रूप में होती है।
पुराने भुवनेश्वर की धरोहर-पदयात्रा: परशुरामेश्वर से शुरुआत कीजिए
परशुरामेश्वर को अकेले देखने के बजाय, उसे पुराने भुवनेश्वर की एक छोटी पदयात्रा का पहला पड़ाव बनाइए। इस तरह आप कलिंग वास्तुकला के विकास को लगभग कालक्रम में, पैदल चलते हुए देख सकेंगे। नीचे एक सुझाया हुआ मार्ग है; दूरियाँ कम हैं, पर समय और खुलने के घंटे स्थानीय रूप से पुष्टि कर लें।
परशुरामेश्वर मंदिर — प्रारंभिक कलिंग शैली, आयताकार जगमोहन, सप्तमातृकाएँ। यहाँ "वर्णमाला" देखिए।
मुक्तेश्वर मंदिर — पास ही; पीढ़ा छत वाला जगमोहन और प्रसिद्ध मेहराबदार तोरण। यहाँ वही अक्षर परिष्कृत रूप में दिखते हैं।
सिद्धेश्वर और केदारगौरी — मुक्तेश्वर परिसर के आसपास के अन्य मंदिर, जो इस क्षेत्र की निरंतर परंपरा दिखाते हैं।
राजारानी मंदिर — लाल-पीले बलुआ पत्थर का मंदिर, जिसमें आज कोई प्रमुख देवता प्रतिष्ठित नहीं; परिपक्व शिखर और सुंदर मूर्तियों के लिए प्रसिद्ध।
बिंदुसागर और लिंगराज — पवित्र सरोवर और भुवनेश्वर का सबसे विशाल मंदिर; यहाँ वर्णमाला एक पूरा महाकाव्य बन चुकी है।
समय हो, तो शहर से लगभग 15 किलोमीटर दूर हीरापुर का छतविहीन चौसठ योगिनी मंदिर भी अवश्य देखें — यह कलिंग क्षेत्र की एक बिल्कुल अलग, गोलाकार और खुली स्थापत्य-परंपरा है।
यात्रा के व्यावहारिक सुझाव
कब जाएँ: अक्टूबर से मार्च सबसे अच्छा समय है। मंदिर बलुआ पत्थर का है और गर्मी में पत्थर बहुत तपता है, इसलिए सुबह जल्दी या शाम को जाना बेहतर रहेगा — इस समय तिरछी धूप में नक्काशी भी अधिक उभरकर दिखती है। कैसे पहुँचें: भुवनेश्वर का बीजू पटनायक अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा और भुवनेश्वर रेलवे स्टेशन, दोनों से पुराना शहर कुछ ही किलोमीटर की दूरी पर है। ध्यान रखें: जगमोहन के भीतर छत नीची और फ़र्श असमान हो सकता है, इसलिए सावधानी से चलें, और सदियों पुरानी नक्काशी को छूने से बचें। यह एक जीवित पूजा-स्थल भी है, इसलिए शालीन वस्त्र और मर्यादा बनाए रखें।
एक सुझाव: अपने साथ एक छोटी नोटबुक ले जाइए और मंदिर का एक सरल रेखाचित्र बनाइए — आमलक, गंडी, जगमोहन की छत। जब आप बाद में लिंगराज देखेंगे और वही रेखाचित्र दोहराएँगे, तो आपको स्वयं समझ आएगा कि यह छोटा मंदिर "शुरुआत" क्यों कहलाता है।
पत्थर की वर्णमाला पढ़ने वालों के लिए
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उपसंहार: छोटे अक्षर, बड़ा महाकाव्य
तो, ओडिशा का यह छोटा मंदिर इतनी बड़ी वास्तुकला की शुरुआत क्यों माना जाता है? इसलिए नहीं कि यह निश्चित रूप से सबसे पुराना है — इस पर विद्वानों में बहस है। बल्कि इसलिए कि यह प्रारंभिक कलिंग शैली का सबसे अच्छी तरह बचा हुआ, सबसे पूर्ण उदाहरण है, और इसमें वे तत्व पहली बार स्पष्ट रूप से एक साथ दिखते हैं जिनसे आगे का पूरा "महाकाव्य" लिखा गया: गर्भगृह से जुड़ा जगमोहन, त्रिरथ रेखा देउल, शैव मंदिर में शक्ति की उपस्थिति, और मूर्तियों में लिखा धार्मिक इतिहास।
और शायद सबसे सुंदर बात यह है कि इसकी कुछ विशेषताएँ आगे नहीं चलीं। ढलवाँ छत वाला आयताकार जगमोहन बाद में छोड़ दिया गया। यह हमें याद दिलाता है कि हर महान परंपरा प्रयोगों, संकोच और सीखने से बनती है। परशुरामेश्वर उस सीखने का पत्थर में दर्ज रिकॉर्ड है।
अगली बार जब आप भुवनेश्वर जाएँ और लिंगराज के शिखर को देखकर विस्मित हों, तो कुछ कदम चलकर इस छोटे मंदिर के सामने भी खड़े होइए। आप उस क्षण को देख रहे होंगे जब ओडिशा के शिल्पियों ने पहली बार वे अक्षर सीखे, जिनसे आगे चलकर कोणार्क जैसा पत्थर का महाकाव्य लिखा गया।
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
परशुरामेश्वर मंदिर कहाँ स्थित है?
परशुरामेश्वर मंदिर ओडिशा की राजधानी भुवनेश्वर के पुराने शहर (एकाम्र क्षेत्र) में, मुक्तेश्वर मंदिर के पास स्थित है।
परशुरामेश्वर मंदिर कितना पुराना है?
अधिकतर विद्वान इसे शैली के आधार पर सातवीं सदी के मध्य, लगभग 650 ई., का मानते हैं। कुछ इतिहासकार इसे आठवीं सदी के आरंभ का बताते हैं।
परशुरामेश्वर मंदिर को ओडिशा वास्तुकला की शुरुआत क्यों माना जाता है?
क्योंकि यह प्रारंभिक कलिंग शैली का सबसे अच्छी तरह संरक्षित उदाहरण है और इसमें पहली बार गर्भगृह से जुड़ा जगमोहन तथा त्रिरथ रेखा देउल जैसी विशेषताएँ स्पष्ट रूप से एक साथ दिखती हैं, जो आगे लिंगराज, जगन्नाथ और कोणार्क तक विकसित हुईं।
परशुरामेश्वर मंदिर का जगमोहन विशेष क्यों है?
इसका जगमोहन आयताकार है और उसकी छत दो स्तरों में ढलवाँ है, जिनके बीच प्रकाश के लिए खुली जगह है। बाद के कलिंग मंदिरों में यह डिज़ाइन छोड़ दिया गया और वर्गाकार, पीढ़ा छत वाले जगमोहन बनने लगे।
परशुरामेश्वर मंदिर में सप्तमातृकाएँ क्यों हैं?
शिव मंदिर होते हुए भी इसमें शक्ति के सात रूपों — सप्तमातृकाओं — का अंकन है, जो ओडिशा की शैव और शाक्त परंपराओं के मेल को दर्शाता है। भुवनेश्वर के मंदिरों में इनका यह पहला ज्ञात चित्रण माना जाता है।
मंदिर पर आठ ग्रह क्यों अंकित हैं, नौ क्यों नहीं?
गर्भगृह के द्वार के ऊपर आठ ग्रहों का अंकन बताया जाता है, जबकि बाद के मंदिरों में नवग्रह दिखते हैं। विद्वान इसे मंदिर की प्रारंभिक तिथि का एक संकेत मानते हैं।
परशुरामेश्वर मंदिर का नाम कैसे पड़ा?
परंपरा के अनुसार यह नाम भगवान परशुराम की तपस्या और उन पर शिव की कृपा से जुड़ा है। एक अन्य मत इसे पाशुपत परंपरा के एक आचार्य से जुड़े पुराने नाम का बदला हुआ रूप मानता है।
परशुरामेश्वर मंदिर देखने का सबसे अच्छा समय क्या है?
अक्टूबर से मार्च का समय सबसे अच्छा है। दिन में सुबह जल्दी या शाम को जाएँ, जब पत्थर ठंडा रहता है और तिरछी धूप में नक्काशी अधिक स्पष्ट दिखती है।