राजस्थान का वो प्राचीन मंदिर नगर जिसे इतिहास लगभग भूल गया — अर्थूणा (उत्थूणक) की कथा

अर्थूणा मंदिर

उत्थूणक

अर्थूणा आज का नाम — बाँसवाड़ा, राजस्थान

नौ सौ साल पहले यह वागड़ के परमार राजाओं की राजधानी थी — बाज़ारों, शिवालयों, जिनालयों और योगिनी मंदिर से भरा एक जीवंत नगर। आज इसका नाम ही धुंधला पड़ चुका है। यह कथा है अर्थूणा मंदिर समूह की: राजस्थान का वह प्राचीन मंदिर नगर, जिसे इतिहास लगभग भूल गया।

1079–80 ई.मंडलेश्वर मंदिर का शिलालेख
लगभग 12मंदिर व मंदिर-समूह
3 परंपराएँशैव, वैष्णव, जैन

कल्पना कीजिए कि आप किसी शहर में घूम रहे हैं और अचानक पता चलता है कि आपके पैरों के नीचे की गली कभी किसी राजधानी का मुख्य मार्ग थी। जिस पत्थर पर आप बैठे हैं, वह किसी राजा द्वारा पिता की स्मृति में बनवाए मंदिर का टूटा कलश है। और जिस खेत में बकरियाँ चर रही हैं, वहाँ कभी पीतल के बर्तन ढालने वाले कारीगरों की भट्टियाँ जलती थीं।

दक्षिण राजस्थान के बाँसवाड़ा ज़िले की गढ़ी तहसील में बसा छोटा-सा गाँव अर्थूणा ठीक ऐसा ही अनुभव देता है। बाहर से यह एक साधारण कस्बा है — बस अड्डा, चाय की दुकानें, खेतों की हरियाली। पर इसकी मिट्टी में एक पूरी सभ्यता सोई हुई है। ग्यारहवीं-बारहवीं सदी में इसका नाम उत्थूणक था, और यह वागड़ क्षेत्र पर शासन करने वाले परमार राजवंश की राजधानी थी।

जयपुर, उदयपुर और जोधपुर की चमक के बीच राजस्थान का यह कोना अक्सर पर्यटन-नक्शों से छूट जाता है। न यहाँ कोई विशाल किला है, न कोई प्रसिद्ध तीर्थ-मेला, न कोई लोकप्रिय फ़िल्मी दृश्य। फिर भी जो लोग यहाँ पहुँचते हैं, वे एक अजीब-सी अनुभूति लेकर लौटते हैं — जैसे किसी भूले हुए पत्र को पढ़ लिया हो, जो सदियों से किसी के इंतज़ार में रखा था।

इस लेख में हम उस पत्र को खोलेंगे। हम देखेंगे कि उत्थूणक अपने स्वर्णकाल में कैसा था, आज उसका क्या बचा है, उसके शिलालेख क्या कहते हैं — और सबसे बड़ा प्रश्न: इतना समृद्ध नगर इतिहास की स्मृति से कैसे फिसल गया?

तब और अब: एक नगर की दो तस्वीरें

किसी भूले हुए स्थान को समझने का सबसे अच्छा तरीका है उसकी दो तस्वीरें साथ रखना — एक जो शिलालेखों और अवशेषों से उभरती है, और एक जो आज आँखों के सामने है। आइए, उत्थूणक की गलियों में दोनों समयों में एक साथ चलें।

लगभग 1080 ई. में

परमार राजा चामुंडराज का शासन है। नगर के केंद्र में उनके पिता की स्मृति में एक विशाल शिव मंदिर की नींव रखी जा रही है। राज्य के अधिकारी भी अपने-अपने शिवालय बनवा रहे हैं। हाट में अनाज, तेल, नमक और वस्त्रों का व्यापार चल रहा है।

आज

मंडलेश्वर महादेव मंदिर गाँव के बस अड्डे के पास कुछ अलग-थलग खड़ा है। उसके भीतर आज भी वही शिलालेख है — अर्थूणा में अपने मूल स्थान पर बचा एकमात्र अभिलेख। बाकी अभिलेख अजमेर के राजकीय संग्रहालय में पहुँच चुके हैं।

बारहवीं सदी में

नगर में शैव साधुओं के साथ जैन श्रावक और व्यापारी भी बसते हैं। 1190 ई. के आसपास भूषण नाम के एक श्रद्धालु ने यहाँ एक भव्य जैन मंदिर बनवाया। शिवालयों और जिनालय के बीच एक योगिनी मंदिर भी खड़ा है।

आज

जैन मंदिर का मुख्य गर्भगृह और उसका बहु-शिखरीय शिखर अपेक्षाकृत अच्छी अवस्था में है, पर आसपास बिखरे स्तंभ, दीवारों के टुकड़े और जिन-प्रतिमाएँ उसके पुराने विस्तार की गवाही देते हैं। चौंसठ योगिनी मंदिर का मंडप अब नहीं बचा।

हाट का दिन

कांस्यकार — पीतल-कांसे के कारीगर — अपने बर्तन बेचने आए हैं। आसपास के व्यापार-केंद्रों तलवाड़ा और पनाहेड़ा से व्यापारी पहुँचे हैं। उत्थूणक इस पूरे व्यापारिक जाल की धुरी है।

आज

अर्थूणा एक शांत, हरा-भरा गाँव है। स्थानीय लोग मंदिरों को जानते हैं और कुछ में पूजा भी होती है, पर राष्ट्रीय स्मृति में यह नाम लगभग अनुपस्थित है। अधिकांश भारतीयों ने इसका नाम तक नहीं सुना।

इन तस्वीरों के बीच नौ सौ वर्षों का अंतर है — और उस अंतर में एक पूरी राजधानी का उत्थान और विस्मरण छिपा है।

"एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति।"

ऋग्वेद 1.164.46 — सत्य एक है, ज्ञानी उसे अनेक नामों से पुकारते हैं

वागड़ के परमार: वे राजा जिन्होंने उत्थूणक बसाया

"वागड़" दक्षिण राजस्थान के उस क्षेत्र का पारंपरिक नाम है जिसमें आज के बाँसवाड़ा और डूंगरपुर ज़िले आते हैं। माही नदी से सिंचित, पहाड़ियों और जंगलों से घिरा यह इलाका गुजरात, मालवा और मेवाड़ के बीच एक सेतु की तरह था। इसी भौगोलिक स्थिति ने इसे व्यापार और संस्कृतियों के मिलन का स्थान बनाया।

ग्यारहवीं सदी में यहाँ परमार राजवंश की एक शाखा का शासन था। परमार वंश की मुख्य धारा मालवा में थी — वही वंश जिसमें विद्वान राजा भोज हुए। वागड़ के परमार इसी विशाल वंश-वृक्ष की एक शाखा थे, जिन्होंने उत्थूणक को अपनी राजधानी बनाया।

अर्थूणा से कुल सात परमारकालीन शिलालेख मिले हैं। इनमें से पाँच राजा चामुंडराज के समय के हैं और दो उनके उत्तराधिकारी विजयराज के समय के। यही अभिलेख इस बात का प्रमाण हैं कि आज का अर्थूणा ही प्राचीन उत्थूणक है — इनमें नगर का नाम उत्थूणक या उत्थापनक के रूप में दर्ज है।

परमार शासकों की सबसे विलक्षण बात थी उनका धार्मिक उदार दृष्टिकोण। उन्होंने शैव धर्म और जैन धर्म — दोनों को एक साथ संरक्षण दिया। उनके शिलालेखों में शिव की स्तुति है, हनुमान (मारुति) का आह्वान है, और विष्णु-उपासना का उल्लेख भी है। अगर आपने हनुमान जी की कथाओं और उनके स्वरूप पर हमारे लेख पढ़े हैं, तो यह जानकर रोमांच होगा कि नौ सौ वर्ष पहले वागड़ के राजा भी अपने अभिलेखों में मारुति का स्मरण करते थे।

मंडलेश्वर शिलालेख: पिता के नाम एक पुत्र का मंदिर

अर्थूणा का सबसे महत्वपूर्ण अभिलेख मंडलेश्वर महादेव मंदिर में आज भी अपनी जगह पर है। यह एक प्रशस्ति (स्तुति-लेख) है, जो बताता है कि राजा चामुंडराज ने 1079–80 ई. में अपने पिता मंडलीक (मंडनदेव) की स्मृति में इस शिव मंदिर का निर्माण आरंभ करवाया। पिता के नाम पर ही देवता का नाम पड़ा — मंडलेश्वर, यानी "मंडलीक के ईश्वर"।

यह अभिलेख एक और रोचक तथ्य दर्ज करता है: इसमें किसी मंदिर के जीर्णोद्धार का उल्लेख है और विष्णु-पूजा की परंपरा का भी। आज अर्थूणा में कोई सक्रिय विष्णु मंदिर नहीं दिखता, पर अभिलेख बताता है कि वैष्णव उपासना भी कभी इस नगर के जीवन का हिस्सा थी।

1080 ई. के एक अन्य अभिलेख के अनुसार, राजा के एक अधिकारी के पुत्र अनंतपाल ने भी यहाँ एक शिव मंदिर स्थापित किया। यानी मंदिर-निर्माण केवल राजा का नहीं, पूरे शासक-वर्ग का सांस्कृतिक कर्तव्य था।

अर्थूणा मंदिर समूह: नगर का पत्थर-रजिस्टर

अर्थूणा गाँव में लगभग बारह मंदिर और मंदिर-समूह हैं। ये एक ही स्थान पर नहीं, बल्कि गाँव में अलग-अलग समूहों में बिखरे हैं — जो इस बात का संकेत है कि ये किसी एक परिसर के नहीं, एक पूरे नगर के मंदिर थे। इनमें से कई पंचायतन शैली में बने हैं, जहाँ मुख्य मंदिर के चारों कोनों पर चार उप-मंदिर होते हैं। नीचे प्रमुख संरचनाओं का परिचय है।

मंडलेश्वर महादेव मंदिरशैव · 1079–80 ई.
अर्थूणा का सबसे प्रसिद्ध और बड़ा मंदिर, जो गाँव के बस अड्डे के निकट कुछ अलग खड़ा है। इसकी प्रशस्ति इसे विशिष्ट बनाती है — अर्थूणा के बहुत कम मंदिरों के पास अपने नाम का ऐसा स्तुति-अभिलेख है। इसकी कुछ विशेषताएँ मालवा के मंदिरों से मेल खाती हैं, जो परमारों के मालवा-संबंध की याद दिलाती हैं।
हनुमानगढ़ी मंदिर समूहशैव व हनुमान उपासना
एक बड़ा मंदिर-समूह जिसमें नीलकंठ महादेव का मंदिर, कई छोटे देवालय, हनुमान जी का एक छोटा मंदिर और एक सीढ़ीदार कुंड है। शिलालेखों में मारुति के आह्वान को देखते हुए, यहाँ की हनुमान-उपासना की जड़ें बहुत पुरानी प्रतीत होती हैं।
सोमेश्वर महादेव मंदिर समूहशैव · पंचायतन
पंचायतन योजना का सुंदर उदाहरण। मुख्य गर्भगृह का शिखर आंशिक रूप से बचा है, पर उसकी बहु-शिखरीय (शेखरी) बनावट और गवाक्ष-अलंकरण स्पष्ट दिखते हैं। एक उप-मंदिर की दीवार पर कमल धारण किए सूर्य देव की प्रतिमा है, जो बताती है कि वह मंदिर सूर्य को समर्पित रहा होगा।
कुंभेश्वर महादेव मंदिरशैव
अर्थूणा के शिव मंदिरों की शृंखला का एक और महत्वपूर्ण सदस्य, जो इस नगर के प्रबल शैव चरित्र को रेखांकित करता है।
चौंसठ योगिनी मंदिरशाक्त-शैव परंपरा
शिव मंदिर और जैन मंदिर के बीच ऊँचे चबूतरे पर स्थित, पर बुरी तरह क्षतिग्रस्त। इसका मंडप नहीं बचा। आसपास घंटा-आकार की छत (घंटासंवरण) के बड़े टुकड़े बिखरे हैं। इसकी स्थापत्य-शैली अर्थूणा के अधिकांश मंदिरों से भिन्न है।
जैन मंदिरजैन · लगभग 1190 ई.
भूषण नामक श्रद्धालु द्वारा निर्मित। मुख्य मंदिर का शिखर बारीक नक्काशीदार और बहु-शिखरीय है; दीवारों पर दिक्पाल और तपस्वी आकृतियाँ हैं। पास के एक खंडित देवालय में काले पत्थर की कायोत्सर्ग मुद्रा में खड़ी एक विशाल तीर्थंकर प्रतिमा है, जिसके आधार-लेख इसे सोलहवीं सदी का बताते हैं — यानी परमारों के जाने के बाद भी यहाँ जैन श्रद्धा जीवित रही।

स्थापत्य की दृष्टि से अर्थूणा के मंदिरों में महा-मारू, महा-गुर्जर और मारू-गुर्जर — तीनों शैलियों का प्रभाव दिखता है। ये वही शैलियाँ हैं जो आगे चलकर पश्चिम भारत के भव्य मंदिरों की पहचान बनीं। सरल शब्दों में, अर्थूणा इस महान स्थापत्य-परंपरा की एक प्रारंभिक प्रयोगशाला था। अगर आप भारत के प्राचीन मंदिरों की स्थापत्य-कथाएँ पढ़ते रहे हैं, तो अर्थूणा उस कथा का एक लुप्त अध्याय है।

"परस्परोपग्रहो जीवानाम्।"

आचार्य उमास्वाति, तत्त्वार्थ सूत्र 5.21 — सभी जीव एक-दूसरे के सहायक हैं

एक नगर, तीन परंपराएँ: उत्थूणक का धार्मिक सह-अस्तित्व

अर्थूणा को विशेष बनाने वाली सबसे बड़ी बात उसके पत्थर नहीं, उसका स्वभाव है। यहाँ शैव, वैष्णव और जैन परंपराएँ एक ही नगर में, एक ही राजसत्ता के संरक्षण में, साथ-साथ फली-फूलीं। आज जब धार्मिक पहचानें अक्सर दीवारें खड़ी करती हैं, उत्थूणक एक ऐसे भारत की याद दिलाता है जहाँ विविधता सहज थी।

शैव उत्थूणक: लकुलीश की परंपरा

अर्थूणा का प्रमुख स्वर शैव है। मंडलेश्वर, नीलकंठ, सोमेश्वर, कुंभेश्वर — अधिकांश बड़े मंदिर शिव को समर्पित हैं। इस स्थान का संबंध लकुलीश पाशुपत संप्रदाय से भी जोड़ा जाता है — शैव धर्म की वह प्राचीन धारा जिसके प्रवर्तक लकुलीश को शिव का अवतार माना जाता है और जो पश्चिम भारत में मध्यकाल में अत्यंत प्रभावशाली थी। महादेव के विविध रूपों और शैव परंपराओं को समझने वालों के लिए अर्थूणा एक जीवित पाठशाला है।

वैष्णव और सौर उपासना के संकेत

हालाँकि आज कोई सक्रिय विष्णु मंदिर नहीं दिखता, पर मंडलेश्वर शिलालेख विष्णु-उपासना की परंपरा दर्ज करता है, और हनुमानगढ़ी में हनुमान की उपस्थिति वैष्णव भक्ति के उस व्यापक दायरे की ओर इशारा करती है। सोमेश्वर समूह के एक उप-मंदिर पर सूर्य देव की प्रतिमा बताती है कि यहाँ सौर उपासना भी थी। पंचायतन शैली स्वयं इस समन्वय का प्रतीक है — एक ही परिसर में अनेक देवताओं का सम्मान।

जैन उत्थूणक: व्यापारियों की श्रद्धा

व्यापारिक नगरों में जैन समुदाय की उपस्थिति स्वाभाविक थी, और उत्थूणक कोई अपवाद नहीं था। 1190 ई. का जैन मंदिर और सोलहवीं सदी की विशाल तीर्थंकर प्रतिमा बताती है कि यहाँ जैन श्रद्धा कई सदियों तक अखंड रही। परमार राजाओं ने इस समुदाय को उतना ही संरक्षण दिया जितना शैव संस्थाओं को।

शाक्त रहस्य: योगिनियों का मंदिर

चौंसठ योगिनी मंदिर इस नगर का सबसे रहस्यमय अध्याय है। योगिनी उपासना तांत्रिक शैव-शाक्त परंपरा से जुड़ी थी और मध्य भारत में मध्यकाल में इसके कई मंदिर बने। अर्थूणा का योगिनी मंदिर, भले खंडित हो, बताता है कि यह नगर केवल मुख्यधारा की भक्ति का ही नहीं, गूढ़ साधना का भी केंद्र था। योगिनी और शक्ति उपासना में रुचि रखने वालों के लिए यह स्थल विशेष महत्व रखता है।

केवल मंदिर नहीं: उत्थूणक का व्यापारिक जीवन

अक्सर हम प्राचीन स्थलों को केवल धार्मिक केंद्र मान लेते हैं। पर उत्थूणक की असली कहानी इससे बड़ी है। इतिहासकारों के अनुसार यह ग्यारहवीं सदी के राजस्थान के सबसे महत्वपूर्ण व्यापारिक केंद्रों में से एक प्रतीत होता है — दक्षिण राजस्थान के व्यापार-केंद्रों के एक समूह की धुरी, जिसमें तलवाड़ा और पनाहेड़ा जैसे केंद्र भी शामिल थे।

1080 ई. के अभिलेख से झाँकता एक हाट

1080 ई. का एक शिलालेख बहुत हद तक अपठनीय है, पर उसके जो हिस्से पढ़े जा सके हैं, उनमें अर्थूणा के हट्ट (हाट या बाज़ार) में बिकने वाली वस्तुओं की सूची है। उसी अभिलेख में कम से कम दो प्रकार के उत्पादकों का उल्लेख है: कांस्यकार यानी पीतल-कांसे का काम करने वाले कारीगर, और कल्यपाल यानी आसव बनाने वाले। यह अभिलेख किसी राजा की विजय का नहीं, एक साधारण बाज़ार का दस्तावेज़ है — और शायद इसीलिए इतना अनमोल है।

सोचिए: नौ सौ साल पुराने पत्थर पर दर्ज है कि उस दिन हाट में क्या बिका। यह हमें राजाओं की नहीं, आम लोगों की दुनिया में ले जाता है — कारीगरों, व्यापारियों, ग्राहकों की। उत्थूणक के मंदिर इसी समृद्ध अर्थव्यवस्था की देन थे। व्यापार से धन आया, धन से संरक्षण, और संरक्षण से वे पत्थर जो आज भी खड़े हैं।

"देखो मेरे कृत्यों को, हे शक्तिशालियो, और निराश हो जाओ! … उस विशाल खंडहर के चारों ओर, अनंत और सूनी रेत दूर तक फैली है।"

पर्सी बिशे शेली, "ओज़िमैंडियस" (1818) — भावानुवाद

इतिहास ने उत्थूणक को क्यों भुला दिया? छह कारण

यह इस लेख का केंद्रीय प्रश्न है। एक राजधानी, एक व्यापारिक धुरी, एक दर्जन मंदिरों वाला नगर — फिर भी आज अधिकांश भारतीयों के लिए अनजाना। इसके पीछे कोई एक घटना नहीं, कई धीमी प्रक्रियाएँ हैं।

राजवंश का अवसान

उत्थूणक का महत्व परमार राजसत्ता से जुड़ा था। बारहवीं सदी के बाद वागड़ में परमार शक्ति क्षीण हुई और क्षेत्र दूसरे शासकों के प्रभाव में चला गया। जब राजधानी राजधानी नहीं रहती, तो संरक्षण, धन और जनसंख्या — सब धीरे-धीरे कहीं और खिसक जाते हैं। बाद की शताब्दियों में वागड़ की राजनीति के केंद्र डूंगरपुर और बाँसवाड़ा जैसे नए नगर बने।

भौगोलिक एकांत

जो पहाड़ियाँ और जंगल कभी उत्थूणक की सुरक्षा थे, वही बाद में उसके एकांत का कारण बने। बड़े राजमार्ग और रेल-मार्ग इस क्षेत्र से दूर रहे। आज भी यहाँ पहुँचना उदयपुर या जयपुर जितना सहज नहीं है, और जो स्थान रास्ते में नहीं पड़ता, वह स्मृति से भी छूट जाता है।

बिखरी हुई गवाहियाँ

अर्थूणा के सात परमारकालीन शिलालेखों में से केवल एक — मंडलेश्वर वाला — अपने मूल स्थान पर है। बाकी अजमेर के राजकीय संग्रहालय में सुरक्षित हैं। यह संरक्षण के लिए आवश्यक था, पर इसका एक परिणाम यह भी हुआ कि नगर की "आवाज़" उससे सैकड़ों किलोमीटर दूर चली गई। आगंतुक मंदिर देखता है, पर उसकी कहानी पढ़ नहीं पाता।

किसी महाकथा का अभाव

भारत में जो स्थल लोकप्रिय हुए, उनके साथ अक्सर कोई पौराणिक कथा, कोई महान युद्ध या कोई बड़ा तीर्थ-मेला जुड़ा है। उत्थूणक के पास ऐसी कोई महाकथा नहीं। उसकी कहानी शांत है — व्यापार, सह-अस्तित्व और श्रद्धा की। दुर्भाग्य से इतिहास अक्सर शोर को याद रखता है, शांति को नहीं।

बड़े स्मारकों की छाया

राजस्थान स्वयं विरासत से इतना समृद्ध है कि छोटे स्थल बड़े स्मारकों की छाया में खो जाते हैं। चित्तौड़, कुंभलगढ़, आमेर, रणकपुर और दिलवाड़ा के बीच अर्थूणा जैसे स्थल पर्यटन-योजनाओं की सूची में नीचे रह जाते हैं — भले उनका ऐतिहासिक महत्व किसी से कम न हो।

समय और उपेक्षा

सदियों की उपेक्षा, प्राकृतिक क्षरण और संभवतः मानवीय क्षति ने कई संरचनाओं को खंडहर बना दिया। जब किसी स्थान के शिखर गिर जाते हैं और मंडप ढह जाते हैं, तो उसकी भव्यता की कल्पना करना कठिन हो जाता है — और लोग उसे "बस कुछ पुराने खंडहर" मानकर आगे बढ़ जाते हैं।

पर एक बात महत्वपूर्ण है: "भूला हुआ" पूरी तरह सही शब्द नहीं है। अर्थूणा के लोग अपने मंदिरों को कभी नहीं भूले — कई में आज भी दीपक जलते हैं, पर्वों पर भीड़ होती है। भुलाया उसे उस बड़ी, राष्ट्रीय स्मृति ने है जो पाठ्यपुस्तकों, पर्यटन-विज्ञापनों और लोकप्रिय कथाओं से बनती है। गाँव ने याद रखा; देश भूल गया।

"जो लोग अतीत को याद नहीं रख सकते, वे उसे दोहराने के लिए अभिशप्त होते हैं।"

जॉर्ज सांतायना, दार्शनिक

पुनर्खोज: पत्थर फिर से बोलने लगे हैं

अच्छी खबर यह है कि उत्थूणक की चुप्पी धीरे-धीरे टूट रही है। अर्थूणा के मंदिर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की देख-रेख में हैं, जिसने कई संरचनाओं को संरक्षित किया है। शोधकर्ताओं ने यहाँ के शिलालेखों, स्थापत्य और मूर्तिकला का विस्तृत अध्ययन किया है। हाल के वर्षों में डिजिटल विरासत परियोजनाओं ने अर्थूणा के मंदिरों के विस्तृत चित्र, भू-योजनाएँ और विवरण ऑनलाइन उपलब्ध कराए हैं, जिससे यह स्थल दुनिया भर के इतिहास-प्रेमियों तक पहुँच रहा है।

सोशल मीडिया ने भी एक भूमिका निभाई है। यात्री और फ़ोटोग्राफ़र अब "अनछुए राजस्थान" की तलाश में अर्थूणा जैसे स्थलों तक पहुँच रहे हैं। मानसून में बाँसवाड़ा की हरियाली के बीच इन धूसर पत्थरों के मंदिरों की तस्वीरें एक अलग ही जादू रचती हैं।

पर पुनर्खोज केवल पुरातत्वविदों या पर्यटकों का काम नहीं है। हर वह पाठक जो यह लेख पढ़कर अर्थूणा का नाम किसी और को बताता है, इस नगर को स्मृति में लौटाने का काम करता है। विरासत केवल पत्थरों में नहीं, उन्हें याद रखने वालों में जीवित रहती है।

"जिन लोगों को अपने अतीत के इतिहास, उद्गम और संस्कृति का ज्ञान नहीं, वे बिना जड़ों के पेड़ जैसे हैं।"

मार्कस गार्वे

अर्थूणा की यात्रा: एक भूले नगर तक कैसे पहुँचें

अगर यह कथा आपको उत्थूणक की गलियों तक बुला रही है, तो यात्रा की योजना कुछ इस तरह बनाइए। अर्थूणा बाँसवाड़ा ज़िले की गढ़ी तहसील में है, और सड़क मार्ग से बाँसवाड़ा तथा गुजरात के संतरामपुर से जुड़ा है।

बाँसवाड़ा सेलगभग 55 किमी दक्षिण-पश्चिम, सड़क मार्ग से
उदयपुर सेलगभग 145–150 किमी; निकटतम हवाई अड्डा महाराणा प्रताप हवाई अड्डा, उदयपुर
रेल मार्गप्रमुख रेलवे स्टेशन रतलाम (मध्य प्रदेश), लगभग 115 किमी
अहमदाबाद सेलगभग 255 किमी; अंतरराष्ट्रीय उड़ानों के लिए सबसे निकट
दर्शन का समयसंरक्षित स्मारक सामान्यतः सूर्योदय से सूर्यास्त तक खुले रहते हैं
सबसे अच्छा मौसमजुलाई–सितंबर की हरियाली या अक्टूबर–फ़रवरी की सुहानी ठंड

दूरी और समय अनुमानित हैं। यात्रा से पहले स्थानीय प्रशासन या ASI कार्यालय से वर्तमान जानकारी की पुष्टि करें।

यात्रा को सार्थक बनाने के सुझाव

पूरा एक दिन अर्थूणा के लिए रखें, क्योंकि मंदिर गाँव में अलग-अलग समूहों में बिखरे हैं। मंडलेश्वर से शुरुआत करें और उसका शिलालेख ज़रूर देखें — यह वह एकमात्र अभिलेख है जो आज भी अपनी जगह पर है। फिर हनुमानगढ़ी, सोमेश्वर समूह, योगिनी मंदिर और जैन मंदिर की ओर बढ़ें। सुबह या ढलती दोपहर की रोशनी में शिखरों की नक्काशी सबसे स्पष्ट दिखती है। स्थानीय लोगों से बात करें — कई कथाएँ किसी पुस्तक में नहीं, उनकी स्मृति में हैं।

मंदिरों में शालीन वस्त्र पहनें, खंडित मूर्तियों और अवशेषों को न छुएँ, और कोई भी पत्थर "स्मृति-चिह्न" के रूप में न उठाएँ। हर टुकड़ा इस नगर की कहानी का एक शब्द है।

आसपास भी देखें

बाँसवाड़ा को "सौ द्वीपों का शहर" कहा जाता है — माही नदी और उसके बाँध के जलाशय में बिखरे टापुओं के कारण। यहाँ का माही बजाज सागर बाँध क्षेत्र मानसून में विशेष रूप से सुंदर लगता है। पास में ही तलवाड़ा के प्राचीन मंदिर अवशेष और प्रसिद्ध त्रिपुर सुंदरी मंदिर हैं, जो वागड़ की आस्था का एक बड़ा केंद्र है। इन सबको मिलाकर दो-तीन दिन की "वागड़ विरासत यात्रा" बनाई जा सकती है। राजस्थान के अन्य आध्यात्मिक स्थलों के लिए हमारे राजस्थान के मंदिरों पर लेख भी देखें।

उत्थूणक का हाट, आज के घर में

नौ सौ साल पहले उत्थूणक के हाट में कांस्यकार अपनी कारीगरी बेचते थे। उसी परंपरा को सम्मान देते हुए, यहाँ राजस्थान की जीवित शिल्प-विरासत से चुनी गई कुछ प्रीमियम वस्तुएँ हैं — जिनमें से कुछ तो वागड़ के बिल्कुल पड़ोस में बनती हैं।

प्रतापगढ़, राजस्थान

थेवा कला पेंडेंट

काँच पर 23 कैरेट सोने की महीन नक्काशी की सदियों पुरानी कला, जो वागड़ के पड़ोसी प्रतापगढ़ की पहचान है। देव-आकृतियों या लोक-दृश्यों वाला थेवा पेंडेंट एक दुर्लभ, विरासत-योग्य उपहार है।

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भीलवाड़ा, राजस्थान

हस्तचित्रित फड़ पेंटिंग

लोक-देवताओं की गाथाओं को कपड़े पर चित्रित करने वाली राजस्थान की प्रसिद्ध परंपरा। एक फड़ चित्र घर की दीवार पर पूरी लोक-महाकाव्य कथा जीवंत कर देता है — उत्थूणक की तरह, कहानी पत्थर नहीं, कपड़े पर।

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नाथद्वारा, राजस्थान

पिछवाई पेंटिंग

श्रीनाथजी के लिए बनाई जाने वाली भव्य पिछवाई चित्रकला — कमल, गायें और ऋतु-उत्सव। अर्थूणा के वैष्णव अतीत की याद दिलाता यह चित्र पूजा-कक्ष या बैठक को राजसी शांति देता है।

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मोलेला, राजस्थान

मोलेला टेराकोटा देव-पट्टिका

मोलेला गाँव के कुम्हारों की हाथ से गढ़ी मिट्टी की देव-पट्टिकाएँ, जिन्हें पारंपरिक रूप से ग्रामीण देवालयों में स्थापित किया जाता है। मिट्टी की सौंधी गरिमा वाला एक अनूठा वॉल डेकोर।

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जयपुर, राजस्थान

जयपुरी ब्लू पॉटरी फूलदान

क्वार्ट्ज़ आधारित, बिना मिट्टी की प्रसिद्ध नीली मीनाकारी पॉटरी। इसके नीले-हरे फूल-पत्ते किसी भी कोने को ताज़गी देते हैं — पूजा के फूल सजाने के लिए भी आदर्श।

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संदर्भ-ग्रंथ

"The Temple Architecture of India" — एडम हार्डी

भारतीय मंदिर-स्थापत्य के विकास पर एक प्रतिष्ठित, चित्रों से भरपूर ग्रंथ। मारू-गुर्जर जैसी शैलियों और शिखर-रचना को गहराई से समझने के लिए यह अर्थूणा जैसे स्थलों को देखने की दृष्टि बदल देता है।

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उपसंहार: भूले हुए नगर हमें क्या सिखाते हैं

अर्थूणा की यात्रा अंततः एक विनम्र करने वाला अनुभव है। यह याद दिलाता है कि हर राजधानी एक दिन गाँव बन सकती है, हर हाट एक दिन खेत, और हर प्रसिद्ध नाम एक दिन धुंधला। उत्थूणक के राजा अपनी प्रशस्तियों में अमरता की कामना करते थे; आज उनके नाम केवल शोधकर्ता जानते हैं।

पर इस नश्वरता में एक गहरी सनातन सीख भी छिपी है। जो बचा, वह राजसत्ता नहीं थी — वह श्रद्धा थी। मंडलेश्वर में आज भी जलता दीपक, जैन प्रतिमा के सामने रखे फूल, हनुमानगढ़ी की परिक्रमा — ये सब बताते हैं कि जिस नगर को इतिहास भूल गया, उसे आस्था ने नहीं भुलाया। राजा चले गए, पर उन्होंने जिन देवताओं के लिए मंदिर बनवाए, वे अब भी वहीं हैं।

और शायद उत्थूणक का सबसे बड़ा उपहार उसका सह-अस्तित्व है। एक ही नगर में शिव के मंदिर, तीर्थंकर का जिनालय, योगिनियों का देवालय और मारुति का स्मरण — बिना किसी टकराव के। ऋग्वेद का "एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति" यहाँ किसी ग्रंथ की पंक्ति नहीं, एक जीवित नगर-योजना थी।

अगली बार जब आप राजस्थान की यात्रा की योजना बनाएँ, तो किलों और महलों के बीच एक दिन उत्थूणक के नाम भी रखिए। वहाँ कोई भव्य स्वागत द्वार नहीं मिलेगा, कोई गाइड-बुक की भीड़ नहीं। मिलेगा केवल एक शांत गाँव, कुछ धूसर शिखर, और नौ सौ साल पुरानी एक फुसफुसाहट — जो बस इतना चाहती है कि कोई उसे फिर से सुन ले। और अगर आपको ऐसी अनकही मंदिर-कथाएँ पसंद हैं, तो रामप्पा मंदिर की कथा भी पढ़िए — एक ऐसा मंदिर जिसका नाम भगवान के नहीं, शिल्पकार के नाम पर पड़ा।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

अर्थूणा मंदिर कहाँ स्थित है?

अर्थूणा मंदिर समूह राजस्थान के बाँसवाड़ा ज़िले की गढ़ी तहसील में अर्थूणा गाँव में स्थित है। यह बाँसवाड़ा शहर से लगभग 55 किमी दक्षिण-पश्चिम और उदयपुर से लगभग 145–150 किमी दूर है।

अर्थूणा का प्राचीन नाम क्या था?

अर्थूणा का प्राचीन नाम उत्थूणक था। परमारकालीन शिलालेखों में यह नाम उत्थूणक या उत्थापनक के रूप में मिलता है। ग्यारहवीं-बारहवीं सदी में यह वागड़ के परमार राजाओं की राजधानी था।

अर्थूणा के मंदिर किसने बनवाए?

अर्थूणा के प्रमुख मंदिर वागड़ के परमार शासकों, विशेषकर राजा चामुंडराज और विजयराज के शासनकाल में बने। राजपरिवार के साथ अधिकारियों और श्रद्धालुओं ने भी मंदिर बनवाए — जैसे अनंतपाल ने 1080 ई. में एक शिव मंदिर और भूषण ने लगभग 1190 ई. में जैन मंदिर।

मंडलेश्वर महादेव मंदिर का इतिहास क्या है?

मंडलेश्वर महादेव मंदिर का निर्माण परमार राजा चामुंडराज ने 1079–80 ई. में अपने पिता मंडलीक (मंडनदेव) की स्मृति में आरंभ करवाया था। मंदिर में उनकी प्रशस्ति आज भी मौजूद है, जो अर्थूणा में अपने मूल स्थान पर बचा एकमात्र शिलालेख है।

अर्थूणा में किन धर्मों और परंपराओं के मंदिर हैं?

अर्थूणा में मुख्य रूप से शैव मंदिर हैं, साथ ही जैन मंदिर और चौंसठ योगिनी मंदिर भी है। शिलालेखों में विष्णु-उपासना और हनुमान (मारुति) के आह्वान का उल्लेख है, और एक उप-मंदिर पर सूर्य प्रतिमा मिलती है। इस तरह यह शैव, वैष्णव, शाक्त और जैन परंपराओं के सह-अस्तित्व का स्थल है।

अर्थूणा को "भूला हुआ मंदिर नगर" क्यों कहा जाता है?

परमार राजसत्ता के अवसान, भौगोलिक एकांत, अधिकांश शिलालेखों के अजमेर संग्रहालय में स्थानांतरण, किसी लोकप्रिय पौराणिक कथा के अभाव और राजस्थान के बड़े स्मारकों की छाया के कारण यह समृद्ध राजधानी राष्ट्रीय स्मृति से लगभग ओझल हो गई, हालाँकि स्थानीय लोग इसे सदा से जानते हैं।

अर्थूणा कैसे पहुँचें?

अर्थूणा सड़क मार्ग से बाँसवाड़ा (लगभग 55 किमी) और गुजरात के संतरामपुर से जुड़ा है। निकटतम हवाई अड्डा उदयपुर (लगभग 145–150 किमी) है और प्रमुख रेलवे स्टेशन रतलाम (लगभग 115 किमी)। अहमदाबाद लगभग 255 किमी दूर है।

अर्थूणा घूमने का सबसे अच्छा समय कौन-सा है?

जुलाई से सितंबर के मानसून में बाँसवाड़ा की हरियाली के बीच मंदिर बेहद सुंदर लगते हैं, जबकि अक्टूबर से फ़रवरी का सुहाना मौसम घूमने के लिए सबसे आरामदायक है। संरक्षित स्मारक सामान्यतः सूर्योदय से सूर्यास्त तक खुले रहते हैं; यात्रा से पहले पुष्टि कर लें।

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