नाम जप को इतना शक्तिशाली क्यों माना गया?
न मंदिर चाहिए, न सामग्री, न कोई विशेष मुहूर्त। बस एक नाम और एक मन। फिर भी हर परंपरा के संत ने इसे सबसे ऊँचा साधन कहा। यह लेख उसी दावे की यात्रा-पुस्तिका है।
आपने किसी बुज़ुर्ग को चलते-चलते होंठ हिलाते देखा होगा। हाथ में माला नहीं, आसपास कोई मंदिर नहीं, बस होंठों पर एक नाम, जो रसोई में भी चलता है, बस में भी, और अस्पताल के बरामदे में भी। यही नाम जप है।
सवाल जायज़ है। एक ही नाम को बार-बार दोहराना इतना शक्तिशाली क्यों माना गया कि तुलसीदास, कबीर, गुरु नानक, चैतन्य महाप्रभु और तुकाराम जैसे संत, अलग-अलग भाषाओं और अलग-अलग इष्ट के होते हुए भी, इसी बिंदु पर आकर मिल गए? और दूसरा सवाल उतना ही ज़रूरी है: इसके बारे में जो कुछ कहा जाता है, जैसे चमत्कार, 50 लाख, 1 करोड़, उसमें कितना शास्त्र है और कितना सुनी-सुनाई?
इस लेख को एक यात्रा-पुस्तिका की तरह पढ़िए। पहले समझेंगे कि यह यात्रा क्या है, फिर रास्ता, नियम, दूरी का हिसाब, सामान, मंज़िल की पहचान, और अंत में वे चेतावनियाँ जो अच्छी यात्रा-पुस्तिकाएँ कभी नहीं छोड़तीं।
नाम जप क्या है और इसके चार प्रकार कौन से हैं
"नाम जप" में दो शब्द हैं। नाम यानी ईश्वर का कोई नाम, जैसे राम, कृष्ण, शिव, दुर्गा या वाहेगुरु। जप यानी उसकी निरंतर, गिनी हुई या लयबद्ध पुनरावृत्ति। लोक में प्रचलित एक निरुक्ति के अनुसार "ज" का भाव जन्म-मरण के चक्र का छेदन है और "प" का भाव पाप का नाश। यह भाषाई व्याख्या है, पर यह बताती है कि परंपरा जप से क्या अपेक्षा रखती थी।
भक्ति की भाषा में तीन शब्द अक्सर साथ आते हैं, और तीनों में हल्का अंतर है:
| शब्द | अर्थ | कैसे होता है |
|---|---|---|
| नाम-स्मरण | नाम को याद रखना | चलते-फिरते, काम के बीच, बिना गिनती के |
| नाम-जप | नाम की गिनी हुई पुनरावृत्ति | माला या संख्या के संकल्प के साथ, एक निश्चित समय पर |
| नाम-संकीर्तन | नाम का गाकर, समूह में उच्चारण | ताल, वाद्य और सामूहिक स्वर के साथ |
जप के चार प्रकार
"जप के चार प्रकार कौन से हैं" यह सबसे ज़्यादा पूछे जाने वाले प्रश्नों में है। परंपरागत वर्गीकरण में जप उच्चारण की सूक्ष्मता के क्रम से बँटा है, और चौथे प्रकार पर अलग-अलग परंपराओं में थोड़ा मतभेद है। सबसे प्रचलित सूची यह है:
| प्रकार | स्वरूप | किसके लिए सहज |
|---|---|---|
| वाचिक | ऊँचे स्वर में, स्पष्ट उच्चारण के साथ | शुरुआत करने वालों और सामूहिक कीर्तन के लिए |
| उपांशु | होंठ और जीभ हिलें, पर ध्वनि लगभग स्वयं ही सुन सकें | घर की नित्य साधना के लिए |
| मानसिक | केवल मन में, बिना होंठ हिलाए | एकाग्र साधकों के लिए, और कहीं भी, कभी भी |
| लिखित | नाम को लिखना, जैसे राम नाम लेखन | जिनका मन बोलने से भटकता है, उनके लिए |
कुछ परंपराएँ चौथे स्थान पर अजपा जप को रखती हैं, यानी वह अवस्था जब नाम साँस के साथ बिना प्रयास अपने-आप चलने लगता है। इसे सभी प्रकारों का शिखर माना जाता है, और यह प्रयास से नहीं, अभ्यास की परिपक्वता से आता है।
जप को गीता में ईश्वर की विभूति कहा गया है:
यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि स्थावराणां हिमालयः॥भगवद्गीता, अध्याय 10, श्लोक 25: यज्ञों में मैं जप-यज्ञ हूँ, स्थिर वस्तुओं में हिमालय
और मनुस्मृति में जप के तीन स्तरों की तुलनात्मक महिमा बताई गई है:
विधियज्ञाज्जपयज्ञो विशिष्टो दशभिर्गुणैः। उपांशुः स्याच्छतगुणः साहस्रो मानसः स्मृतः॥मनुस्मृति 2.85: जप-यज्ञ विधिपूर्वक किए गए यज्ञ से दस गुना श्रेष्ठ है, उपांशु जप सौ गुना और मानस जप हज़ार गुना
इसे गणित की तरह मत पढ़िए। यहाँ "दस, सौ, हज़ार" का भाव यह है कि जैसे-जैसे जप भीतर उतरता है, बाहरी कर्मकांड पर उसकी श्रेष्ठता बढ़ती जाती है। यही कारण है कि सबसे सूक्ष्म जप, यानी मानसिक जप, सबसे ऊँचा माना गया।
राम नाम लेखन पुस्तिका (लिखित जप कॉपी सेट)
लिखित जप, जो चौथा प्रकार माना जाता है, उन लोगों के लिए बहुत सुगम है जिनका मन बोलने पर भटक जाता है। छपे खानों वाली यह कॉपी रोज़ का लक्ष्य तय करने और प्रगति गिनने में मदद करती है, और परिवार के बच्चों को भी नाम से जोड़ने का सरल तरीक़ा है।
Amazon पर देखेंनाम जप इतना शक्तिशाली क्यों माना गया: पाँच कारण
अलग-अलग परंपराओं के ग्रंथ और संत-वाणी पढ़ने पर शक्ति के पीछे पाँच कारण बार-बार लौटते हैं। इन्हें एक-एक करके देखते हैं।
1. नाम और नामी अलग नहीं हैं
भारतीय चिंतन में शब्द केवल ध्वनि नहीं, सत्ता का सूक्ष्म रूप है। इसीलिए भक्ति-परंपराएँ मानती हैं कि ईश्वर का नाम और स्वयं ईश्वर एक-दूसरे से अलग नहीं हैं, यानी नाम में नामी उपस्थित है। तुलसीदास ने रामचरितमानस के बालकांड में तो यहाँ तक कहा कि नाम अपने नामी से भी बड़ा है, क्योंकि राम तक पहुँचने का मार्ग नाम से ही बनता है। जिसे आप पुकारते हैं, वह पुकार के साथ ही निकट आ जाता है, यह इस विश्वास का सार है।
2. यह सबसे सुलभ साधन है
यज्ञ के लिए सामग्री और पुरोहित चाहिए, तीर्थ के लिए यात्रा, ध्यान के लिए लंबा अभ्यास। नाम के लिए केवल जीभ या मन चाहिए, जो हर किसी के पास है। इसी सुलभता को पुराणों ने कलियुग का युग-धर्म कहा। भागवत पुराण का प्रसिद्ध कथन है:
कलेर्दोषनिधे राजन्नस्ति ह्येको महान् गुणः। कीर्तनादेव कृष्णस्य मुक्तसङ्गः परं व्रजेत्॥भागवत पुराण 12.3.51: हे राजन्, कलियुग दोषों का सागर है, पर इसमें एक महान गुण है: केवल कृष्ण-कीर्तन से ही मनुष्य आसक्ति से मुक्त होकर परम गति पाता है
हरेर्नाम हरेर्नाम हरेर्नामैव केवलम्। कलौ नास्त्येव नास्त्येव नास्त्येव गतिरन्यथा॥बृहन्नारदीय पुराण: कलियुग में हरि-नाम ही एकमात्र आधार है, दूसरा कोई मार्ग नहीं
यही बात लोक की भाषा में तुलसीदास ने कही: "कलियुग केवल नाम अधारा। सुमिरि सुमिरि नर उतरहिं पारा॥" (रामचरितमानस, उत्तरकांड)। ध्यान रहे, ये वचन नाम की महिमा बताने वाले भक्ति-ग्रंथों के हैं, और इनका आशय दूसरे साधनों की निंदा करना नहीं, बल्कि यह याद दिलाना है कि सबसे साधारण व्यक्ति के हाथ में भी एक साधन है।
3. नाम मन को एक खूँटी देता है
गीता में अर्जुन स्वीकार करता है कि मन वायु की तरह चंचल है, और कृष्ण इसका उत्तर अभ्यास और वैराग्य बताते हैं। नाम जप इसी अभ्यास का सबसे सरल रूप है। मन को रोकना कठिन है, पर उसे एक काम दे देना आसान है, और वह काम है एक नाम की पुनरावृत्ति। तुलसीदास ने इसे एक सुंदर रूपक में कहा है:
राम नाम मनिदीप धरु जीह देहरीं द्वार। तुलसी भीतर बाहेरहुँ जौं चाहसि उजिआर॥रामचरितमानस, बालकांड: यदि भीतर और बाहर, दोनों ओर उजाला चाहते हो, तो जीभ की देहरी पर राम-नाम का मणि-दीप रख दो
देहरी, यानी दहलीज़, घर के भीतर और बाहर दोनों को रोशन करती है। नाम की भी यही भूमिका है: वह भीतर के विचारों को भी उजाला देता है और बाहर के व्यवहार को भी।
4. इसमें समय और स्थान की कोई बाध्यता नहीं
बाक़ी साधनों के लिए शुद्धि, आसन, समय और स्थान के नियम हैं। नाम के लिए चैतन्य महाप्रभु ने अपने शिक्षाष्टक में स्पष्ट कहा:
नाम्नामकारि बहुधा निजसर्वशक्तिस्तत्रार्पिता नियमितः स्मरणे न कालः।शिक्षाष्टकम् (श्रीकृष्ण चैतन्य), श्लोक 2: आपने अपने नामों में अपनी सारी शक्तियाँ रख दी हैं, और उनके स्मरण के लिए कोई निर्धारित समय नहीं है
इसका व्यावहारिक अर्थ है कि नाम-स्मरण को जीवन के हर क्षण में बुना जा सकता है, और इसी निरंतरता में उसकी शक्ति है। एक घंटे की पूजा से ज़्यादा असर कई बार दिन भर के बिखरे हुए सौ क्षणों में किए गए स्मरण का होता है।
5. यह अहंकार को गलाता है
जब आप दिन भर "मैं, मेरा" में जी रहे होते हैं, तब किसी और का नाम दोहराना मन की धुरी बदल देता है। कबीर ने इसी बदलाव को दो पंक्तियों में कह दिया:
जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाहिं। सब अँधियारा मिट गया, जब दीपक देख्या माहिं॥कबीर
तो "सबसे शक्तिशाली नाम जप कौन सा है?" हर परंपरा अपने इष्ट के नाम को सर्वोच्च कहती है: शैव पंचाक्षर को, वैष्णव नारायण या कृष्ण-नाम को, रामभक्त राम-नाम को, सिख वाहेगुरु को। इनमें से किसी को "सबसे ऊपर" सिद्ध करना शास्त्र का नहीं, तुलना का खेल है। परंपरा का व्यावहारिक उत्तर यह है: वही नाम सबसे शक्तिशाली है जो आपके हृदय के निकट हो और जिसे आप निरंतर, बिना ऊबे, दोहरा सकें।
गोमुखी (जप-थैली)
गोमुखी वह कपड़े की थैली है जिसमें हाथ और माला को ढककर जप किया जाता है। इससे माला साफ़ रहती है, हाथ की गतिविधि लोगों की नज़र से अलग रहती है, और मन अपने-आप भीतर की ओर मुड़ता है। नित्य जप करने वालों के लिए यह एक पारंपरिक, उपयोगी साथी है।
Amazon पर देखेंभारत भर में नाम की यात्रा: एक ही सूत्र, अनेक रंग
नाम जप किसी एक संप्रदाय की संपत्ति नहीं है। यह भारत की भक्ति-धारा का वह साझा पुल है जिस पर अलग-अलग परंपराएँ अलग-अलग रंग लेकर चलती हैं।
| क्षेत्र / परंपरा | प्रमुख नाम | विशेषता |
|---|---|---|
| महाराष्ट्र: वारकरी संप्रदाय | विट्ठल-विट्ठल, राम-कृष्ण-हरि | पंढरपुर की वारी में लाखों लोग नाम-घोष करते हुए पैदल चलते हैं; संत ज्ञानेश्वर का हरिपाठ नाम-महिमा का गान है |
| बंगाल और ओडिशा: गौड़ीय वैष्णव | हरे कृष्ण महामंत्र | चैतन्य महाप्रभु ने हरिनाम संकीर्तन को जन-आंदोलन बना दिया |
| असम: शंकरदेव की परंपरा | राम और कृष्ण के नाम | नामघर में सामूहिक नाम-कीर्तन ही उपासना का केंद्र है |
| पंजाब: सिख परंपरा | वाहेगुरु | "नाम जपो, किरत करो, वंड छको" गुरु नानक के तीन सूत्रों में नाम पहला है |
| उत्तर भारत: संत परंपरा | राम-नाम | कबीर, रैदास और तुलसीदास ने नाम को गृहस्थ जीवन के बीच की साधना बनाया |
| दक्षिण भारत: शैव और वैष्णव | नमः शिवाय, नारायण | नायनमारों के भजनों में पंचाक्षर, आळवारों के दिव्य प्रबंधम में नाम-गान |
| राजस्थान और गुजरात | कृष्ण-नाम | मीराबाई और नरसिंह मेहता के भजनों में नाम प्रेम की भाषा बन गया |
इस सूची में कुछ कथाएँ विशेष रूप से मार्मिक हैं। छत्तीसगढ़ का रामनामी समाज नाम को ही अपना आराध्य मानता है। इसके अनुयायी पूरे शरीर पर "राम" नाम गुदवाते हैं, राम-नाम लिखी चादर ओढ़ते हैं, और मूर्ति के बजाय केवल नाम की उपासना करते हैं। यानी वहाँ नाम जप केवल अभ्यास नहीं, पूरी पहचान है। हनुमान जी की कथा में भी राम-नाम की यही अनन्यता सबसे ऊँचे रूप में मिलती है, जिसे आप हनुमान जी की कथा में पढ़ सकते हैं।
शैव परंपरा में पंचाक्षर "नमः शिवाय" की जड़ें वेद तक जाती हैं। यजुर्वेद के श्रीरुद्रम् के नमकम् में "नमः शिवाय च" का उल्लेख मिलता है। वैष्णव परंपरा में महामंत्र के सोलह नामों का स्रोत कलिसंतरण उपनिषद माना जाता है:
इति षोडशकं नाम्नां कलिकल्मषनाशनम्। नातः परतरोपायः सर्ववेदेषु दृश्यते॥कलिसंतरण उपनिषद: ये सोलह नाम कलियुग के दोषों का नाश करने वाले हैं; इनसे श्रेष्ठ उपाय वेदों में नहीं दिखता (उपनिषद में नामों का क्रम राम-पहले है, जबकि गौड़ीय परंपरा कृष्ण-पहले क्रम से जपती है)
जम्मू की ओर वैष्णो देवी की यात्रा में भी नाम जप का जीवित रूप दिखता है। पूरी चढ़ाई पर लाखों तीर्थयात्री "जय माता दी" का जयकारा लगाते चलते हैं, और थकान की जगह नाम ही उनके क़दमों की लय बन जाता है। यात्रा की तैयारी के लिए हमारा वैष्णो देवी यात्रा गाइड देखिए।
माला बनाम मन: कबीर की चेतावनी
इतनी परंपराओं में एक बात और साझा है: बाहरी गिनती से ज़्यादा भीतर का ध्यान माना गया। कबीर का यह दोहा हर नाम-साधक को याद रखना चाहिए:
माला फेरत जुग गया, फिरा न मन का फेर। कर का मनका डारि दे, मन का मनका फेर॥कबीर
रामनामी दुपट्टा / शॉल
"राम" नाम की पंक्तियों से सजा यह सूती दुपट्टा, रामनामी परंपरा से प्रेरित, पूजा या जप के समय ओढ़ने के लिए है। नाम से घिरे रहने का भाव अपने-आप मन को शांत करता है, और यह परिवार के बुज़ुर्गों के लिए एक सुंदर भेंट भी है।
Amazon पर देखेंकरताल और मंजीरा सेट (कीर्तन हेतु)
नाम-संकीर्तन की ताल करताल और मंजीरे के बिना अधूरी लगती है। पीतल की इनकी खनक घर के कीर्तन, एकादशी के भजन और सत्संग को वही जीवंत लय देती है जो वारी और नामघर में सुनाई देती है।
Amazon पर देखेंक्या दीक्षा ज़रूरी है, कब जपें, और क्या बिस्तर पर नाम जप कर सकते हैं
वीज़ा: क्या दीक्षा चाहिए?
यहाँ एक ज़रूरी भेद है। बीज-मंत्र और विशेष मंत्र आम तौर पर गुरु से दीक्षा लेकर जपे जाते हैं। पर भगवान का नाम, जैसे राम, कृष्ण, शिव या हरि, अधिकांश भक्ति-परंपराओं में सभी के लिए खुला माना गया है, क्योंकि इसे कलियुग की विशेष कृपा कहा गया। फिर भी जिन संप्रदायों में आपकी पारिवारिक या गुरु-परंपरा है, वहाँ उसके नियम को प्राथमिकता देना ही उचित है।
मौसम: कब जपना श्रेष्ठ है
परंपरा में ब्रह्म मुहूर्त, यानी सूर्योदय से लगभग डेढ़ घंटा पहले का समय, जप के लिए श्रेष्ठ माना गया है, क्योंकि तब मन सबसे शांत रहता है। सोमवार और प्रदोष शिव-नाम के लिए, एकादशी विष्णु और कृष्ण-नाम के लिए, और मंगलवार-शनिवार हनुमान जी के लिए विशेष माने जाते हैं। इनकी सही तिथियाँ आप हमारे आज का पंचांग पर देख सकते हैं।
पर यहाँ श्रेष्ठ समय और अनिवार्य समय का भेद समझना चाहिए। ब्रह्म मुहूर्त श्रेष्ठ है, अनिवार्य नहीं। ऊपर के शिक्षाष्टक का सूत्र "स्मरण में कोई निर्धारित समय नहीं" यहाँ भी लागू होता है। इसलिए जो सुबह नहीं जप पाते, वे दिन या रात में जपें, पर जपें ज़रूर।
बिस्तर पर नाम जप: हाँ या नहीं?
यह प्रश्न लगभग हर घर में उठता है, और इसका उत्तर किस प्रकार के जप की बात हो रही है इस पर निर्भर करता है।
| स्थिति | बिस्तर पर कर सकते हैं? | सलाह |
|---|---|---|
| मानसिक नाम-स्मरण, सोने से पहले | हाँ | कई संत इसे सबसे अच्छी आदत कहते हैं; नाम के साथ सोना, नाम के साथ जागना |
| बीमारी, चोट या वृद्धावस्था में | हाँ | शरीर की सीमा में मन से जप स्वीकार्य है, और राहत भी देता है |
| माला से गिनती वाला नियमित जप | बेहतर नहीं | सीधे बैठकर, स्वच्छ स्थान पर करें; लेटने पर नींद और बेपरवाही आती है |
| संकल्प-आधारित अनुष्ठान (सवा लाख, पुरश्चरण) | नहीं | आसन, शुद्धि और नियम के साथ ही |
यानी नाम-स्मरण कहीं भी हो सकता है, पर किसी संकल्प या अनुष्ठान से जुड़ा जप अनुशासन माँगता है। एक सरल कसौटी है: अगर लेटकर जपते हुए आप नींद या मन के भटकाव में डूब जाते हैं, तो उठकर बैठ जाइए।
1 दिन में कितना जप, और 50 लाख या 1 करोड़ का हिसाब
अब वह हिस्सा, जिसके बारे में सबसे ज़्यादा खोजा जाता है: कितना जप? पहले इसका सीधा गणित, ताकि संख्याओं के इर्द-गिर्द फैले भ्रम साफ़ हों। यहाँ एक माला को लगभग 10 मिनट माना गया है, जो नाम की लंबाई और गति के अनुसार 4 से 12 मिनट तक बदल सकती है।
| लक्ष्य | कुल मालाएँ | 5 माला / दिन | 16 माला / दिन | 21 माला / दिन | कुल समय |
|---|---|---|---|---|---|
| 1 लाख जप | 926 | लगभग 6 माह | लगभग 2 माह | लगभग 44 दिन | 154 घंटे |
| सवा लाख | 1,157 | लगभग 7.5 माह | लगभग 72 दिन | लगभग 55 दिन | 193 घंटे |
| 5 लाख | 4,630 | लगभग 2.5 वर्ष | लगभग 9.5 माह | लगभग 7 माह | 772 घंटे |
| 50 लाख | 46,296 | लगभग 25 वर्ष | लगभग 8 वर्ष | लगभग 6 वर्ष | 7,716 घंटे (≈ 322 दिन लगातार) |
| 1 करोड़ | 92,593 | लगभग 51 वर्ष | लगभग 16 वर्ष | लगभग 12 वर्ष | 15,432 घंटे (≈ 643 दिन लगातार) |
तो एक दिन में कितना जप हो सकता है?
शास्त्रों में इसकी कोई ऊपरी सीमा नहीं बताई गई, और कोई न्यूनतम भी सार्वभौमिक नहीं। परंपराओं में कुछ व्यावहारिक मानक मिलते हैं। नए साधक एक माला (108 जप) से शुरू करते हैं। आगे चलकर 3, 5, 11 या 21 मालाएँ आम हैं। गौड़ीय वैष्णव दीक्षित भक्तों के लिए प्रतिदिन 16 माला (यानी 1,728 नाम, लगभग दो घंटे) का नियम है। दूसरी ओर किसी भी साधक के लिए सबसे अच्छी संख्या वह है जिसे वह बिना टूटे, वर्षों तक निभा सके। रोज़ एक माला दस साल तक निभाने वाला व्यक्ति रोज़ बीस माला एक महीने में छोड़ देने वाले से कहीं आगे जाता है।
"सवा लाख" और पुरश्चरण का नियम
परंपरागत अनुष्ठानों में संख्या का एक नियम मिलता है, जिसे पुरश्चरण कहते हैं। इसमें मंत्र के अक्षरों की संख्या को एक लाख से गुणा किया जाता है। उदाहरण के लिए पंचाक्षर "नमः शिवाय" (5 अक्षर) का पुरश्चरण 5 लाख जप, "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" (12 अक्षर) का 12 लाख और "श्रीराम जय राम जय जय राम" (13 अक्षर) का 13 लाख जप माना जाता है। इसके बाद दशांश हवन, तर्पण और ब्राह्मण भोजन की परंपरा है। यह एक विधान-आधारित अनुष्ठान है, जो गुरु के निर्देश में किया जाता है, और रोज़ के साधारण नाम-स्मरण से अलग है।
50 लाख या 1 करोड़ जप करने से क्या होता है?
सीधी और ईमानदार बात: मैंने किसी प्रामाणिक शास्त्र में "50 लाख जप का यह फल, 1 करोड़ का वह फल" जैसी कोई सार्वभौमिक तालिका नहीं देखी। ऐसे आँकड़े ज़्यादातर लोक-कथनों, संत-चरित्रों और सोशल मीडिया की पोस्टों में मिलते हैं। ऊपर की तालिका बताती है कि 1 करोड़ जप जीवन के दशकों का प्रश्न है, कोई सप्ताह भर की साधना नहीं। परंपरा जो फल बार-बार बताती है, वह बाहरी चमत्कार से ज़्यादा भीतरी रूपांतरण है: मन की स्थिरता, नाम में रुचि, आसक्ति में कमी और करुणा की वृद्धि। जो इसे धन, पद या रोग-मुक्ति की गारंटी की तरह बेचे, उससे सावधान रहिए।
माला, काउंटर और ऐप, और शिव या कृष्ण का नाम जप कैसे करें
माला के नियम
माला में 108 दाने और एक बड़ा दाना होता है, जिसे सुमेरु कहते हैं। जप सुमेरु से शुरू होकर सुमेरु पर रुकता है, और उसे लाँघा नहीं जाता। एक माला पूरी होने पर माला पलट दी जाती है। परंपरा में माला अँगूठे और मध्यमा या अनामिका की सहायता से फेरी जाती है, और तर्जनी का स्पर्श नहीं किया जाता। माला का चयन भी इष्ट के अनुसार होता है: शिव के लिए रुद्राक्ष, विष्णु और कृष्ण के लिए तुलसी, देवी के लिए प्रायः स्फटिक या रक्त चंदन।
काउंटर, ऐप और ऑनलाइन जप
आजकल नाम जप के लिए काउंटर, ऐप और ऑनलाइन साधन बहुत खोजे जाते हैं, और वे उपयोगी भी हैं। हाथ में रखने वाला टैली काउंटर या फ़ोन का ऐप गिनती का बोझ उठा लेता है और संकल्प की प्रगति दिखाता है। पर दो सावधानियाँ ज़रूरी हैं। पहली, फ़ोन पर जप करते समय सूचनाएँ बंद (डू-नॉट-डिस्टर्ब) रखिए, क्योंकि एक नोटिफ़िकेशन पूरी एकाग्रता तोड़ देता है। दूसरी, गिनती को प्रतियोगिता मत बनाइए। संख्या साधन है, लक्ष्य नहीं।
शिव का नाम जप कैसे करें
- नाम चुनिए: "ॐ नमः शिवाय" (पंचाक्षर) सबसे प्रचलित है।
- रुद्राक्ष माला लीजिए, और सोमवार या प्रदोष से शुरुआत कीजिए।
- पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके स्वच्छ आसन पर बैठिए।
- 1 माला से शुरू कर 5 या 11 माला तक बढ़ाइए।
- अंत में शांत बैठकर कुछ क्षण नाम की गूँज सुनिए।
शिव के अन्य नाम और उनके अर्थ भगवान शिव के 108 नाम में देखिए।
कृष्ण का नाम जप कैसे करें
- नाम चुनिए: "हरे कृष्ण महामंत्र" या "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय"।
- तुलसी माला लीजिए, और एकादशी से शुरुआत कीजिए।
- कृष्ण या विष्णु की छवि के सामने आसन पर बैठिए।
- पहले 1 से 4 माला कीजिए, फिर धीरे-धीरे 16 तक बढ़ाइए।
- जप के बाद थोड़ी देर कीर्तन या शांत स्मरण कीजिए।
कृष्ण और राम जैसे अवतारों की कथा भगवान विष्णु के दशावतार में पढ़िए।
देवी-उपासकों के लिए भी नाम-जप की यही विधि है, केवल इष्ट और माला बदलती है। देवी के नाम और उनकी पूजा-विधि के लिए देवी लक्ष्मी की उपासना विधि देखिए।
लड्डू गोपाल पूजा सेट (पोशाक, सिंहासन और आभूषण सहित)
कृष्ण-नाम जपने वाले घरों में लड्डू गोपाल की सेवा सबसे लोकप्रिय परंपरा है। पोशाक, सिंहासन, मुकुट और बांसुरी वाला यह पूर्ण सेट नित्य सेवा और जप को एक भावपूर्ण केंद्र देता है, और जन्माष्टमी से लेकर रोज़ की आरती तक काम आता है। यह भारत के सबसे अधिक खोजे जाने वाले प्रीमियम पूजा-सेटों में से एक है।
Amazon पर देखेंनाम जप कब सिद्ध होता है
"कब सिद्ध होता है" का उत्तर किसी तारीख़ या संख्या में नहीं है। परंपरा में सिद्धि का अर्थ चमत्कारी शक्तियाँ नहीं, बल्कि नाम का स्वभाव बन जाना है। इसके कुछ पहचाने जाने वाले संकेत हैं:
- रुचि का जागना। जप बोझ की जगह स्वाद बनने लगता है, और बिना जपे दिन अधूरा लगने लगता है। गौड़ीय परंपरा इसे नाम-रुचि कहती है।
- मन का ठहराव। जप के दौरान मन भटकता है, पर लौटने में अब कम समय लगता है।
- अपने-आप चलना। दिन में बिना प्रयास भीतर नाम की गूँज चलती रहती है, जिसे ही अजपा की शुरुआत माना गया।
- क्रोध और प्रतिक्रिया का धीमा पड़ना। पहले जिस बात पर तुरंत भड़कते थे, उस पर अब एक क्षण का ठहराव आता है।
- करुणा का बढ़ना। दूसरों के प्रति कठोरता घटती है, और निंदा का रस कम होता जाता है।
- कठिन समय में आधार। संकट में पहली प्रतिक्रिया घबराहट की जगह नाम का स्मरण बनने लगती है।
गौड़ीय परंपरा इस प्रगति को तीन चरणों में बाँटती है। पहले नामापराध, जब जप होता है पर मन अशुद्ध और असावधान रहता है। फिर नामाभास, जब नाम की झलक भर मिलती है। अंत में शुद्ध नाम, जब नाम पूरी निर्मलता से भीतर बसता है। भागवत पुराण (षष्ठ स्कंध) में अजामिल की कथा नामाभास का उदाहरण मानी जाती है। मृत्यु के क्षण में अपने पुत्र "नारायण" को पुकारने भर से वह यमदूतों से बच गया, और बाद में उसने वास्तविक साधना अपनाई। कथा का संदेश यह है कि नाम का एक अधूरा, बेसुध उच्चारण भी व्यर्थ नहीं जाता, पर उसे एक आरंभ मानना चाहिए, अंत नहीं।
यह सब रामचरितमानस की उसी पंक्ति में समा जाता है, जो सिद्धि को प्रकाश के रूप में देखती है: जिसके द्वार पर नाम का दीप जल गया, उसके भीतर और बाहर दोनों उजाले से भर जाते हैं। इस पूरी परंपरा को मूल रूप में पढ़ने के लिए रामचरितमानस सबसे सुलभ ग्रंथ है।
रामचरितमानस (गीता प्रेस, बृहद संस्करण)
नाम-महिमा, कलियुग में नाम की प्रधानता और राम-नाम की कथाओं को मूल चौपाइयों और सरल हिंदी अर्थ के साथ पढ़ने के लिए गीता प्रेस का यह बृहद संस्करण हर घर की पुस्तकों में होना चाहिए। रोज़ कुछ पंक्तियाँ पढ़ना भी नाम जप का सुंदर पूरक है।
Amazon पर देखेंनाम के भी अपराध होते हैं: और सबसे बड़ा "नाम के बल पर पाप"
ज़्यादातर लोग मानते हैं कि नाम जप एक तरह की "गारंटी" है: जितना ज़्यादा जपो, उतना सब कुछ ठीक। पर नाम की परंपरा स्वयं इस सोच को चेतावनी के साथ रोकती है। पद्म पुराण के आधार पर गौड़ीय वैष्णव परंपरा दस नाम-अपराध गिनाती है, यानी ऐसे आचरण जिनसे जप का फल रुक जाता है। इनमें तीन सबसे आसानी से समझ आते हैं:
- संतों और भक्तों की निंदा। जो नाम जपे और साथ ही दूसरों की बुराई में रस ले, उसके जप में गाँठ पड़ी रहती है।
- नाम के बल पर पाप करना। यह सोचकर ग़लत काम करना कि "इतना जप कर लिया है, सब धुल जाएगा।" परंपरा इसे सबसे गंभीर अपराध मानती है।
- जप के समय असावधानी। मन कहीं और, होंठ कहीं और। यह भी अपराध की श्रेणी में आता है, क्योंकि इसमें नाम के प्रति आदर नहीं बचता।
कुछ संप्रदाय अपने इष्ट के नाम को अन्य देवताओं से स्वतंत्र या सर्वोपरि मानने की बात भी इस सूची में जोड़ते हैं। यह सम्प्रदाय-विशेष की मान्यता है, और इस लेख में इसे किसी पर थोपा नहीं गया है। जो बात सभी परंपराओं में समान रूप से सच है, वह यह कि नाम कोई छूट-पत्र नहीं, एक सम्बन्ध है, और सम्बन्ध में आचरण का भी हिसाब होता है।
यही कारण है कि पुराने संत संख्या से ज़्यादा भाव और आचरण पर ज़ोर देते थे। इस पूरी परंपरा का यह सबसे कम बताया गया, पर सबसे ज़रूरी नियम है।
नाम जप के चमत्कार, उसके वैज्ञानिक लाभ और ज़्यादा जपने का प्रश्न
परंपरा किन "चमत्कारों" की बात करती है
भक्ति-साहित्य में नाम के प्रभाव की अनेक कथाएँ हैं: प्रह्लाद का अग्नि और विष से बच निकलना (भागवत पुराण, सप्तम स्कंध), अजामिल की कथा, मीराबाई के विष-प्याले की लोक-कथा, और सेतु-निर्माण में राम-नाम से तैरते पत्थरों की कथा। इन्हें भक्ति-आख्यान की तरह पढ़ना चाहिए, यानी ऐसी कथाएँ जो यह सिखाती हैं कि संकट में नाम पर टिके व्यक्ति का मन टूटता नहीं। पर संतों ने स्वयं सबसे बड़ा चमत्कार बाहरी घटनाओं को नहीं, मन के रूपांतरण को कहा: ग़ुस्सैल का शांत होना, लोभी का संतुष्ट होना, भयभीत का निर्भय होना।
विज्ञान क्या कहता है, और क्या नहीं
1970 के दशक में हार्वर्ड के चिकित्सक हर्बर्ट बेन्सन ने दिखाया कि किसी एक शब्द या ध्वनि की शांत पुनरावृत्ति शरीर में रिलैक्सेशन रिस्पॉन्स जगाती है। इसके बाद मंत्र-पुनरावृत्ति पर कई छोटे और मध्यम अध्ययन हुए हैं। निष्कर्ष उत्साहजनक हैं, पर सीमित हैं।
| दावा | अध्ययन क्या संकेत देते हैं | ईमानदार निष्कर्ष |
|---|---|---|
| तनाव और बेचैनी घटती है | शब्द-पुनरावृत्ति से विश्राम की स्थिति के प्रमाण मिलते हैं | सहायक अभ्यास, उपचार का विकल्प नहीं |
| एकाग्रता बढ़ती है | नियमित ध्यान-आधारित पुनरावृत्ति से ध्यान-नियंत्रण में सुधार के संकेत | संभावित लाभ, पर नियमितता पर निर्भर |
| साँस धीमी और लयबद्ध होती है | धीमा, लंबा उच्चारण साँस की गति घटा सकता है | स्वाभाविक शारीरिक प्रभाव, पर जादुई नहीं |
| रोग ठीक होते हैं, धन आता है | कोई विश्वसनीय वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध नहीं | ऐसा दावा न मानें; चिकित्सा कभी न छोड़ें |
"ज़्यादा नाम जपने से क्या होता है?"
परंपरा के अनुसार अधिक जप मन को गहराई और स्थिरता देता है, और नाम-रुचि बढ़ाता है। पर गीता का एक सूत्र यहाँ संतुलन सिखाता है:
युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु। युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा॥भगवद्गीता, अध्याय 6, श्लोक 17: जो आहार-विहार, कर्म और नींद-जागरण में संतुलित है, उसी का योग दुःखों का नाश करने वाला होता है
यानी नींद, भोजन, परिवार और कर्तव्य छोड़कर जप की संख्या बढ़ाना योग नहीं माना गया। तीन सावधानियाँ याद रखिए:
- कर्तव्य से पलायन न बनाइए। जप काम का विकल्प नहीं, काम को अर्थ देने वाली पृष्ठभूमि है।
- चिकित्सा न छोड़िए। नाम जप मन की शांति देता है, पर बीमारी का इलाज डॉक्टर ही करेंगे।
- यदि जप बेचैनी में बदल जाए, तो रुकिए। अगर बार-बार दोहराने की ज़बरदस्ती महसूस हो, न गिन पाने पर घबराहट हो, या जप करने से बेचैनी बढ़ने लगे, तो इसे किसी मनोचिकित्सक या विश्वस्त परामर्शदाता से साझा कीजिए। सच्चा जप राहत देता है, घबराहट नहीं।
तो नाम जप शक्तिशाली क्यों है?
क्योंकि यह एक ही साथ सबसे सरल और सबसे गहरा है। सरल, क्योंकि इसमें कुछ ख़र्च नहीं होता, कोई शर्त नहीं लगती और कोई भी, किसी भी क्षण शुरू कर सकता है। गहरा, क्योंकि जो एक नाम को सच्चे मन से दोहराता रहता है, उसका मन धीरे-धीरे उस नाम के रंग में रँगने लगता है। संतों ने इसे कभी चमत्कार दिखाने का साधन नहीं माना, बल्कि मन को उसके अपने स्रोत तक लौटाने का मार्ग माना।
तो आज रात सोने से पहले, बिना माला और बिना संकल्प के, बस एक नाम चुन लीजिए, जो आपके हृदय के निकट हो, और उसे धीरे-धीरे भीतर दोहराते-दोहराते नींद में उतर जाइए। यात्रा का पहला क़दम इतना ही छोटा होता है।
पोर्टेबल हारमोनियम (भजन-कीर्तन हेतु)
नाम-संकीर्तन को घर में सामूहिक रूप देने के लिए हारमोनियम सबसे पारंपरिक साथी है। हल्का, पोर्टेबल और अच्छे सुर वाला हारमोनियम एकादशी के कीर्तन, सत्संग और पारिवारिक भजन-संध्या को जीवंत बना देता है, और संगीत-शिक्षा के लिए भी काम आता है। यह देश के सबसे अधिक खोजे जाने वाले भक्ति-वाद्यों में से एक है।
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नाम जप क्या है?
नाम जप ईश्वर के किसी नाम, जैसे राम, कृष्ण, शिव या वाहेगुरु, को निरंतर और श्रद्धा से दोहराने की साधना है। इसमें स्मरण (बिना गिनती), जप (गिनती के साथ) और संकीर्तन (गाकर, समूह में) तीनों रूप आते हैं। भक्ति-परंपराओं में इसे सबसे सुलभ साधन माना गया है।
जप के चार प्रकार कौन से हैं?
सबसे प्रचलित वर्गीकरण में जप के चार प्रकार वाचिक (ऊँचे स्वर में), उपांशु (होंठ हिलें, ध्वनि लगभग अपने ही कानों तक), मानसिक (केवल मन में) और लिखित (नाम लिखना) हैं। कुछ परंपराएँ चौथे स्थान पर अजपा जप, यानी साँस के साथ स्वतः चलने वाले जप, को रखती हैं।
क्या बिस्तर पर नाम जप कर सकते हैं?
मानसिक नाम-स्मरण बिस्तर पर, सोने से पहले या बीमारी में, किया जा सकता है, और कई संत इसे अच्छी आदत मानते हैं। पर माला से गिना जाने वाला नियमित जप या संकल्प-आधारित अनुष्ठान स्वच्छ स्थान पर, आसन पर बैठकर करना श्रेष्ठ माना गया है।
एक दिन में कितना नाम जप करना चाहिए?
शास्त्रों में कोई सार्वभौमिक संख्या तय नहीं है। नए साधक आम तौर पर एक माला (108 जप) से शुरू करते हैं, फिर 3, 5, 11 या 21 मालाओं तक बढ़ते हैं। गौड़ीय वैष्णव दीक्षित भक्तों के लिए प्रतिदिन 16 माला (1,728 नाम) का नियम है। सबसे अच्छी संख्या वह है जिसे आप बिना टूटे निभा सकें।
सबसे शक्तिशाली नाम जप कौन सा है?
हर परंपरा अपने इष्ट के नाम को सर्वोच्च मानती है: शैव पंचाक्षर "नमः शिवाय", वैष्णव नारायण या कृष्ण-नाम, रामभक्त राम-नाम, सिख वाहेगुरु। परंपरा का व्यावहारिक उत्तर यह है कि वही नाम सबसे शक्तिशाली है जो आपके हृदय के निकट हो और जिसे आप निरंतर जप सकें।
ज़्यादा नाम जपने से क्या होता है?
परंपरा के अनुसार अधिक जप से मन की स्थिरता और नाम के प्रति रुचि बढ़ती है। पर गीता (6.17) संतुलित आहार, नींद और कर्म पर ज़ोर देती है, इसलिए कर्तव्य और स्वास्थ्य छोड़कर जप की संख्या बढ़ाना उचित नहीं। यदि जप बेचैनी या ज़बरदस्ती जैसा लगने लगे, तो किसी परामर्शदाता से बात करें।
50 लाख या 1 करोड़ नाम जप करने से क्या होता है?
किसी प्रामाणिक शास्त्र में 50 लाख या 1 करोड़ जप के किसी निश्चित, सार्वभौमिक फल की तालिका नहीं मिलती। 1 करोड़ जप लगभग 92,593 मालाओं के बराबर है, जो रोज़ 16 माला करने पर लगभग 16 वर्ष में पूरा होता है। परंपरा जिस फल पर ज़ोर देती है, वह मन की स्थिरता, नाम में रुचि और आसक्ति में कमी जैसा भीतरी रूपांतरण है, न कि कोई गारंटीकृत चमत्कार।
नाम जप कब सिद्ध होता है?
परंपरा में सिद्धि का कोई निश्चित समय या संख्या नहीं है। इसके संकेत हैं: जप में रुचि जागना, मन का जल्दी लौट आना, नाम का बिना प्रयास भीतर चलते रहना, क्रोध का धीमा पड़ना और करुणा का बढ़ना। गौड़ीय परंपरा इसे नामापराध, नामाभास और शुद्ध नाम, इन तीन चरणों में समझाती है।
नाम जप के क्या चमत्कार हैं?
भक्ति-साहित्य में प्रह्लाद, अजामिल और मीराबाई जैसी कथाएँ नाम के प्रभाव को दर्शाती हैं, जिन्हें श्रद्धा के आख्यान की तरह पढ़ा जाता है। संतों ने सबसे बड़ा चमत्कार मन के रूपांतरण को कहा, यानी क्रोध का शांत होना, लोभ का घटना और भय का मिटना। नाम जप चिकित्सा या धन-प्राप्ति की गारंटी नहीं है।
नाम जप के वैज्ञानिक लाभ क्या हैं?
शब्द या मंत्र की शांत पुनरावृत्ति पर हुए छोटे और मध्यम अध्ययन तनाव में कमी, एकाग्रता में सुधार और साँस की लयबद्धता के संकेत देते हैं, जिसकी शुरुआत हर्बर्ट बेन्सन के रिलैक्सेशन रिस्पॉन्स शोध से हुई। ये लाभ सहायक हैं, चिकित्सा का विकल्प नहीं, और रोग-निवारण या धन-प्राप्ति के दावों का कोई विश्वसनीय वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है।
नाम का एक अंश किसी अपने तक पहुँचाइए
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Instagram Facebook Pinterestयह लेख सनातन धर्म और भक्ति-परंपराओं के अंतर्गत शैक्षिक भाव से प्रस्तुत किया गया है। नाम जप की विधि, गिनती और नियम संप्रदाय, गुरु-परंपरा और पारिवारिक रीति के अनुसार बदल सकते हैं; कृपया अपने गुरु या परिवार की परंपरा को प्राथमिकता दें। यह लेख चिकित्सा या मनोवैज्ञानिक परामर्श का विकल्प नहीं है; स्वास्थ्य संबंधी चिंता के लिए योग्य चिकित्सक से मिलें।