भक्ति के नौ रूप कौन-से हैं? क्या हर भक्त का मार्ग अलग हो सकता है?

नवधा भक्ति
नवधा भक्ति · भक्ति के नौ रूप

भक्ति के नौ रूप कौन-से हैं? क्या हर भक्त का मार्ग अलग हो सकता है?

एकादशी की शाम, एक ही कमरे में नौ लोग। कोई सुन रहा है, कोई गा रहा है, कोई चुपचाप बैठा है। सब एक ही देवता के सामने हैं, फिर भी किसी की भक्ति किसी से मेल नहीं खाती। और शास्त्र कहते हैं: यही ठीक है।

भागवत पुराण में प्रह्लाद ने भक्ति के नौ रूप गिनाए, रामचरितमानस में राम ने शबरी को नौ रूप बताए, और दोनों सूचियाँ एक-जैसी नहीं हैं।
9भक्ति के रूप
भागवत 7.5.23मूल श्लोक
2नवधा की दो प्रसिद्ध सूचियाँ
1राम के अनुसार एक भी पर्याप्त

बचपन में मेरी नानी के घर की एकादशी ऐसी ही होती थी। एक बैठक, एक ठाकुरजी, और नौ लोग, जिनमें कोई भी दो एक-जैसी भक्ति नहीं करते थे। नानाजी आँखें बंद करके कथा सुनते, मौसी ढोलक पर भजन गातीं, मामाजी घंटी बजाकर पूजा करते, और सबसे पीछे बैठी परनानी बस हाथ जोड़े रहतीं। मैं छोटी थी, और मुझे लगता था कि इनमें से कोई एक तरीक़ा ज़रूर "सही" होगा, बाक़ी अधूरे।

बाद में पता चला कि भक्ति के सबसे प्राचीन ग्रंथों ने इस दृश्य को बहुत पहले ही लिख दिया था। उसे नवधा भक्ति, यानी भक्ति के नौ रूप, कहा गया। इस लेख में हम उसी बैठक में चलकर नौ लोगों से मिलेंगे, हर एक के साथ एक रूप समझेंगे, और अंत में उस प्रश्न पर लौटेंगे जो शीर्षक में है: क्या हर भक्त का मार्ग अलग हो सकता है?

एक स्पष्टता: नानी के घर के ये नौ पात्र उदाहरण के लिए गढ़े गए हैं, पर इनके जैसे लोग लगभग हर घर में मिल जाते हैं। हर पात्र के बाद का "शास्त्र की कसौटी" वाला हिस्सा पूरी तरह ग्रंथ-आधारित है।

पहले, मूल श्लोक

नवधा भक्ति क्या है और इसके नौ रूप कौन-से हैं

नवधा भक्ति का सबसे प्रसिद्ध आधार भागवत पुराण के सप्तम स्कंध में है। असुरराज हिरण्यकशिपु ने अपने पाँच वर्ष के पुत्र प्रह्लाद से पूछा कि गुरुओं से सीखी हुई सबसे श्रेष्ठ बात क्या है। प्रह्लाद ने उत्तर दिया:

श्रवणं कीर्तनं विष्णोः स्मरणं पादसेवनम्। अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्यमात्मनिवेदनम्॥ इति पुंसार्पिता विष्णौ भक्तिश्चेन्नवलक्षणा। क्रियेत भगवत्यद्धा तन्मन्येऽधीतमुत्तमम्॥श्रीमद्भागवत महापुराण 7.5.23-24: श्रवण, कीर्तन, स्मरण, पादसेवन, अर्चन, वंदन, दास्य, सख्य और आत्मनिवेदन, भक्ति के ये नौ लक्षण यदि पहले विष्णु को अर्पित करके फिर आचरण में लाए जाएँ, तो मैं इसी को सर्वोत्तम विद्या मानता हूँ

इस श्लोक में एक बारीक बात छिपी है: भक्ति पहले अर्पित की जाती है, फिर की जाती है। यानी नौ रूपों का अभ्यास कोई ऐसा काम नहीं जो करके बाद में भगवान को दिखाया जाए। उसे आरंभ से ही उनके नाम पर, उनकी ओर मुँह करके किया जाना चाहिए।

भक्ति-साहित्य में एक और प्रसिद्ध श्लोक इन नौ रूपों के साथ नौ आदर्श भक्तों के नाम भी जोड़ देता है:

श्रीविष्णोः श्रवणे परीक्षिदभवद् वैयासकिः कीर्तने प्रह्लादः स्मरणे तदङ्घ्रिभजने लक्ष्मीः पृथुः पूजने। अक्रूरस्त्वभिवन्दने कपिपतिर्दास्येऽथ सख्येऽर्जुनः सर्वस्वात्मनिवेदने बलिरभूत् कृष्णाप्तिरेषां परम्॥भक्ति-साहित्य में व्यापक रूप से उद्धृत प्रसिद्ध श्लोक (मूल रचयिता को लेकर परंपरा में मतभेद है): श्रवण में परीक्षित, कीर्तन में शुकदेव, स्मरण में प्रह्लाद, पादसेवन में लक्ष्मी, अर्चन में पृथु, वंदन में अक्रूर, दास्य में हनुमान, सख्य में अर्जुन और आत्मनिवेदन में बलि

अब इन नौ को एक पन्ने में देख लीजिए, फिर नानी के घर में चलेंगे।

क्र.भक्ति का रूपसरल अर्थआदर्श भक्त
1श्रवणभगवान की कथा और गुणों को श्रद्धा से सुननाराजा परीक्षित
2कीर्तननाम और लीलाओं का गायन या उच्चारणशुकदेव जी
3स्मरणनाम, रूप और लीला का निरंतर चिंतनप्रह्लाद
4पादसेवनप्रभु के चरणों की सेवा, और सेवा-भाव से किया गया हर कर्मदेवी लक्ष्मी
5अर्चनविधिपूर्वक पूजनमहाराज पृथु
6वंदनप्रणाम, स्तुति और विनम्रताअक्रूर जी
7दास्यस्वयं को सेवक मानकर कर्तव्य-निष्ठाहनुमान जी
8सख्यईश्वर को सखा मानकर निःसंकोच संबंधअर्जुन
9आत्मनिवेदनस्वयं को और अपना सब कुछ प्रभु को सौंप देनाराजा बलि
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नारद भक्ति सूत्र (हिंदी टीका सहित)

भक्ति को स्वयं परिभाषित करने वाला सबसे संक्षिप्त और गहरा ग्रंथ, जिसमें नवधा से भी आगे भक्ति के ग्यारह रूपों की चर्चा मिलती है। हिंदी टीका के साथ यह पुस्तक भक्ति के पूरे दर्शन को समझने की सबसे सुगम शुरुआत है।

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एक घर, नौ भक्त

नानी के घर की एकादशी: नौ रूप, नौ लोग

1

श्रवण: नानाजी

सुनने की भक्ति

नानाजी की आँखें अब कमज़ोर हैं, पर कान सबसे तेज़। वे कुर्सी पर पीछे टिककर आँखें बंद कर लेते हैं और फ़ोन पर चल रही भागवत कथा सुनते हैं। उन्हें किताब खोलने की ज़रूरत नहीं, कथा सीधे भीतर उतरती है। बीच-बीच में वे सिर्फ़ इतना कहते हैं, "अहा!" और बाक़ी पूरा कमरा उनके लिए जैसे ग़ायब हो जाता है।

शास्त्र की कसौटी

श्रवण का अर्थ है भगवान की कथा, नाम और गुणों को श्रद्धा से सुनना। आदर्श भक्त राजा परीक्षित हैं। श्राप के कारण उनके पास केवल सात दिन बचे थे, और उन्होंने इन्हीं सात दिनों में शुकदेव जी के मुख से संपूर्ण भागवत सुनी। उनकी साधना में कोई विधि, कोई माला, कोई सामग्री नहीं थी, केवल एकाग्र श्रवण था।

आज कैसे करेंकिसी संत की वाणी या कथा का पाँच मिनट का अंश चलते-फिरते सुनिए।
2

कीर्तन: मौसी

गाने की भक्ति

मौसी की आवाज़ सुरीली नहीं है, यह वे ख़ुद हँसकर मानती हैं। पर जैसे ही वे ढोलक अपनी गोद में खींचकर "हरि बोल" उठाती हैं, आँगन की सारी महिलाएँ बिना कहे ताली बजाने लगती हैं। उनके लिए भक्ति गाए बिना पूरी नहीं होती, और उनके गाते-गाते कमरे की थकान उतरने लगती है।

शास्त्र की कसौटी

कीर्तन यानी नाम और लीलाओं का गायन। आदर्श भक्त शुकदेव जी हैं, जिन्हें श्लोक में "वैयासकि" (व्यास के पुत्र) कहा गया। उन्होंने भागवत का गान किया। भागवत पुराण (12.3.51) कलियुग में इसी कीर्तन को सबसे बड़ा साधन बताता है, जैसा हम नाम जप वाले लेख में देख चुके हैं।

आज कैसे करेंकोई एक भजन पूरा गाइए, अकेले ही सही, सुर की चिंता किए बिना।
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भजन ढोलक (कीर्तन हेतु)

भजन और कीर्तन की लय ढोलक के बिना अधूरी लगती है। शीशम की लकड़ी का यह भजन ढोलक घर की एकादशी, सत्संग और पारिवारिक कीर्तन को वह जीवंत ताल देता है जो मौसी जैसे साधकों की पहचान है।

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3

स्मरण: अनन्या, कॉलेज जाने वाली भांजी

भीतर दोहराने की भक्ति

अनन्या कभी ज़ोर से कुछ नहीं बोलती। बस में, परीक्षा हॉल के बाहर, या अस्पताल की कतार में, उसके होंठ बहुत हल्के हिलते हैं। वह एक ही नाम को भीतर दोहराती रहती है, जैसे किसी ने मन के एक कोने में दीया रख दिया हो। किसी को पता भी नहीं चलता कि उसकी भक्ति चल रही है।

शास्त्र की कसौटी

स्मरण का अर्थ है नाम, रूप और लीला का निरंतर चिंतन। आदर्श भक्त प्रह्लाद हैं, जिन पर विष, अग्नि, हाथी और पर्वत से फेंके जाने जैसे संकट आए, और हर संकट में उनका मन प्रभु के स्मरण से हिला नहीं। नाम जप इसी स्मरण का गिना हुआ रूप है, जिसे हमने अपने अलग लेख में विस्तार से देखा है।

आज कैसे करेंसोने से पहले एक नाम चुनकर उसे तीन बार मन में दोहराइए।
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तुलसी कंठी माला

विष्णु और कृष्ण के भक्तों में तुलसी की कंठी धारण करने की परंपरा है, जो हर क्षण स्मरण की याद दिलाती रहती है। हल्की और सादी यह कंठी नाम-स्मरण को दिनचर्या में बाँधने का सरल, पारंपरिक साथी है।

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4

पादसेवन: मामी

सेवा की भक्ति

मामी मंदिर में कम और रसोई में ज़्यादा दिखती हैं। उन्होंने कभी नहीं कहा कि वे भक्त हैं। नानाजी की चप्पलें उनके पैरों के पास सरकाना, नानी की दवा का समय याद रखना, आने वाले हर अतिथि के लिए पहले पानी, फिर बात। उनके लिए हर काम चरणों की सेवा है, और इसीलिए कोई काम छोटा नहीं।

शास्त्र की कसौटी

पादसेवन का शाब्दिक अर्थ है प्रभु के चरणों की सेवा। व्यापक अर्थ में मंदिर और तीर्थ की सेवा, संतों की सेवा, और ज़रूरतमंदों में प्रभु का रूप देखकर की गई सेवा भी इसमें आती है। आदर्श भक्त देवी लक्ष्मी हैं, जिन्हें विष्णु के चरणों के पास सेवा-भाव से बैठे दर्शाया जाता है। उनकी उपासना की विधि देवी लक्ष्मी की उपासना विधि में पढ़ सकते हैं।

आज कैसे करेंआज किसी एक व्यक्ति की, बिना बताए और बिना श्रेय के, कोई छोटी सेवा कीजिए।
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शुद्ध चाँदी की चरण पादुका जोड़ी

प्रभु के चरणों की सेवा का सबसे सीधा प्रतीक चरण पादुका है। शुद्ध चाँदी की यह पादुका जोड़ी ठाकुरजी के सिंहासन के पास स्थापित की जाती है और पादसेवन का भाव रोज़ की पूजा में जीवित रखती है। यह दीपावली, गृह-प्रवेश और विवाह जैसे अवसरों पर उपहार में भी भारत में बहुत पसंद की जाती है।

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5

अर्चन: मामाजी

विधि की भक्ति

मामाजी की पूजा एक पूरी व्यवस्था है। पाँच बजे उठना, स्नान, ताज़े फूल, चंदन, दीपक, घंटी, और हर चीज़ अपनी जगह पर। उन्हें अव्यवस्था पसंद नहीं, क्योंकि उनके लिए पूजन का हर उपचार प्रभु के प्रति आदर का एक अलग इशारा है। वे कहते हैं, "ठाकुरजी को जो भी दो, सलीक़े से दो।"

शास्त्र की कसौटी

अर्चन का अर्थ है विधिपूर्वक पूजन। आदर्श भक्त महाराज पृथु हैं (भागवत, चतुर्थ स्कंध), जिन्होंने राजा होते हुए भी प्रभु की निरंतर पूजा को अपने कर्तव्य का केंद्र बनाया। पूजा के पाँच मूल उपचार और उनके भाव आप हमारे आरती-थाली वाले लेख में देख सकते हैं।

आज कैसे करेंआज की पूजा में कोई एक वस्तु, चाहे एक फूल ही, पूरे मन से और सलीक़े से अर्पित कीजिए।
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तांबे का पंचपात्र और आचमनी सेट

पारंपरिक विधि से पूजन में जल-आचमन के लिए पंचपात्र और आचमनी का प्रयोग होता है। शुद्ध तांबे का यह सेट अर्चन को सलीक़ेदार और शास्त्र-सम्मत बनाता है, और रोज़ की पूजा में एक सुव्यवस्थित केंद्र देता है।

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6

वंदन: बड़े मौसाजी

झुकने की भक्ति

बड़े मौसाजी की भक्ति सिर के झुकने में है। रास्ते में किसी मंदिर का कलश दिख जाए तो वे वहीं ठहरकर हाथ जोड़ लेते हैं। किसी संत, किसी बुज़ुर्ग, किसी बच्चे तक को वे इतनी सहजता से नमस्कार करते हैं कि पता ही नहीं चलता कि वे किसी को छोटा या बड़ा मान रहे हैं। उनके लिए नमस्कार एक आदत नहीं, अहंकार को हल्का करने का नित्य अभ्यास है।

शास्त्र की कसौटी

वंदन यानी प्रणाम, स्तुति और विनम्रता। आदर्श भक्त अक्रूर जी हैं। कंस के आदेश पर कृष्ण को मथुरा ले जाने निकले अक्रूर ने मार्ग में कृष्ण के चरण-चिह्न देखे, तो रथ से उतरकर उसी धूल में लोट गए (भागवत, दशम स्कंध)। उन्होंने पहले दर्शन से भी पहले चरण-रज को प्रणाम किया।

आज कैसे करेंआज किसी को सचमुच झुककर और ध्यान से नमस्कार कीजिए, किसी औपचारिकता की तरह नहीं।
7

दास्य: छोटे मामा

सेवक-भाव की भक्ति

छोटे मामा कभी "मुझे यह चाहिए" नहीं कहते। वे सिर्फ़ पूछते हैं, "आज क्या सेवा है?" नानाजी के कुछ कहने से पहले ही वे वह काम कर चुके होते हैं। उनका कोई श्रेय नहीं, कोई शिकायत नहीं, और फिर भी उनके चेहरे पर एक अजीब-सी तृप्ति रहती है, जैसे किसी ने उन्हें कोई बड़ा पुरस्कार दे दिया हो।

शास्त्र की कसौटी

दास्य का अर्थ है स्वयं को प्रभु का सेवक मानकर आज्ञा-पालन और कर्तव्य-निष्ठा। श्लोक में दास्य के आदर्श के रूप में "कपिपति" का नाम आता है, जिसे परंपरा हनुमान जी के रूप में पढ़ती है। उनकी पूरी कथा, जिसमें राम के हर कार्य में सेवा सबसे ऊपर है, आप हनुमान जी की कथा में पढ़ सकते हैं।

आज कैसे करेंआज एक कर्तव्य बिना शिकायत और बिना श्रेय की आशा के निभाइए।
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हनुमान जी की प्रतिमा (दास्य-भक्ति के प्रतीक)

राम के चरणों में विनीत भाव से बैठे या संजीवनी पर्वत उठाए हनुमान जी की प्रतिमा दास्य भक्ति का सबसे जीवंत प्रतीक है। घर के मंदिर या अध्ययन-कक्ष में इसे स्थापित करने से हर कार्य को सेवा-भाव से करने की प्रेरणा मिलती है, और यह भारत में सर्वाधिक खोजी जाने वाली मूर्तियों में गिनी जाती है।

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8

सख्य: गोपाल, ममेरा भाई

मित्रता की भक्ति

गोपाल भगवान से ऐसे बात करता है जैसे किसी पुराने दोस्त से। कभी हँसकर, कभी शिकायत के साथ: "आज तूने ठीक नहीं किया यार।" पहले-पहल सबको यह अटपटा लगता था। फिर नानी ने कहा, "उसे रहने दो। उसे जैसा आता है, वैसे ही मिलने दो।" गोपाल की सबसे बड़ी ताक़त यह है कि उसे ईश्वर के सामने कुछ बनकर नहीं जाना पड़ता।

शास्त्र की कसौटी

सख्य यानी ईश्वर को मित्र मानकर निःसंकोच संबंध। आदर्श भक्त अर्जुन हैं। विश्वरूप दर्शन के बाद वे घबराकर क्षमा माँगते हैं कि अनजाने में उन्होंने कृष्ण को केवल मित्र समझकर कितना सहज संबोधन किया:

सखेति मत्वा प्रसभं यदुक्तं हे कृष्ण हे यादव हे सखेति॥ (भगवद्गीता 11.41)

सख्य का दूसरा प्रसिद्ध उदाहरण कृष्ण और सुदामा की मित्रता है (भागवत, दशम स्कंध)।

आज कैसे करेंआज पाँच मिनट अपनी साधारण भाषा में ईश्वर से बात कीजिए, बिना किसी शास्त्रीय शब्द के।
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कृष्ण-सुदामा मित्रता प्रतिमा

कृष्ण और सुदामा का आलिंगन सख्य भक्ति का सबसे प्रिय दृश्य है। यह प्रतिमा घर के पूजा-स्थान या बैठक में मित्रता, सरलता और निःस्वार्थ प्रेम का स्मरण बनी रहती है, और मित्रों को भेंट देने के लिए भी एक अर्थपूर्ण उपहार है।

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9

आत्मनिवेदन: परनानी

पूर्ण समर्पण की भक्ति

परनानी अब बहुत कम बोलती हैं। उनके पास अपना कुछ बचा नहीं है। जो मिलता है, उसे वे "उसका प्रसाद" कहती हैं, और जो चला जाता है, उसे "उसकी इच्छा"। उनकी प्रार्थना एक ही वाक्य है, जो उन्होंने जीवन भर दोहराया है:

मेरा मुझ में कुछ नहीं, जो कुछ है सो तेरा। तेरा तुझको सौंपते, क्या लागत है मेरा॥कबीर (प्रचलित दोहा)
शास्त्र की कसौटी

आत्मनिवेदन का अर्थ है स्वयं को और अपने सब कुछ को प्रभु को सौंप देना। आदर्श भक्त राजा बलि हैं। वामन अवतार को तीन पग भूमि का वचन देने के बाद, जब तीसरे पग के लिए कुछ शेष न रहा, तो बलि ने अपना सिर आगे कर दिया (भागवत, अष्टम स्कंध)। इस कथा का पूरा संदर्भ भगवान विष्णु के दशावतार में मिलता है।

आज कैसे करेंदिन की शुरुआत में एक वाक्य कहिए: "आज जो भी होगा, तेरी इच्छा से।"
नानी का उत्तर

क्या हर भक्त का मार्ग अलग हो सकता है?

उस शाम मैंने आख़िरकार नानी से पूछ ही लिया, "नानी, सबकी भक्ति अलग क्यों है? कोई एक तरीक़ा तो सही होगा न?" नानी हँसीं, और उन्होंने आँगन के तुलसी-चौरे की ओर इशारा किया जहाँ गेंदा, चमेली और तुलसी तीनों एक ही मिट्टी में खिले थे। "इन्हें देखो। मिट्टी एक है, धूप एक है। पर हर कोई अपनी ही तरह खिलता है।"

यह कोई सांत्वना भर का उत्तर नहीं था। शास्त्र स्वयं यही कहते हैं, और कई जगह कहते हैं।

गीता: ईश्वर हर भक्त को उसी की तरह मिलता है

ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्। मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः॥भगवद्गीता 4.11: जो मुझे जिस भाव से भजते हैं, मैं उन्हें उसी भाव से भजता हूँ; सब मनुष्य सब प्रकार से मेरे ही मार्ग का अनुसरण करते हैं

इसी गीता में भक्तों के प्रकार भी गिनाए गए हैं:

चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोऽर्जुन। आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ॥भगवद्गीता 7.16: चार प्रकार के पुण्यशील लोग मुझे भजते हैं, दुःख से पीड़ित, जानने की इच्छा वाला, कुछ पाने की कामना वाला और ज्ञानी

बारहवें अध्याय (श्लोक 8 से 11) में तो कृष्ण क्रमशः सरल होते विकल्प रखते हैं। यदि मन को पूरी तरह मुझमें स्थिर न कर सको, तो अभ्यास करो। यदि वह भी न हो सके, तो मेरे लिए कर्म करो। यदि वह भी कठिन लगे, तो कर्मों के फल का त्याग करो। यानी मार्ग साधक की क्षमता के अनुसार चुना जाता है, साधक को मार्ग के अनुसार ढाला नहीं जाता।

पर क्या सभी नौ ज़रूरी हैं?

नहीं, और इसका सबसे स्पष्ट उत्तर रामचरितमानस में राम ने स्वयं दिया है। आगे उसे देखेंगे। यहाँ इतना कहना काफ़ी है कि श्लोक में भी नौ आदर्श भक्त एक-एक रूप के प्रतीक हैं, नौ-के-नौ के नहीं। परीक्षित ने केवल सुना, हनुमान ने केवल सेवा की, बलि ने केवल सौंप दिया, और तीनों को परम प्राप्ति मानी गई।

अपना स्वाभाविक रूप कैसे पहचानें

यदि आप स्वभाव से...आपके लिए स्वाभाविक रूप
सुनना और विचार करना पसंद करते हैंश्रवण
गाना, ताल देना और समूह में रमना पसंद करते हैंकीर्तन
शांत, अंतर्मुखी हैं और मन में दोहराना सहज लगता हैस्मरण
हाथ से काम करके, दूसरों की मदद करके तृप्त होते हैंपादसेवन
सलीक़ा, व्यवस्था और विधि-विधान पसंद करते हैंअर्चन
विनम्र हैं, तीर्थ और संतों के सामने सहज झुक जाते हैंवंदन
कर्तव्य-निष्ठ हैं और काम में अपना समर्पण खोजते हैंदास्य
खुले, संवादी हैं और हर बात ईश्वर से कह देना चाहते हैंसख्य
"जो भी हो, तेरी इच्छा" की अवस्था की ओर बढ़ रहे हैंआत्मनिवेदन

इसे किसी प्रश्नावली की तरह नहीं, एक संकेत की तरह पढ़िए। परिपक्व भक्त अक्सर कई रूपों को एक साथ जीते हैं। नानाजी सुनते भी हैं, कभी-कभी गुनगुनाते भी हैं। और बाक़ी रूप जीवन के अलग-अलग मोड़ पर खुलते जाते हैं।

दूसरी सूची

रामचरितमानस की नवधा भक्ति: शबरी को राम का उपदेश

"नवधा भक्ति चौपाई" और "नवधा भक्ति रामचरितमानस" की खोज इसी प्रसंग के लिए होती है। वनवास के दौरान राम मतंग ऋषि की शिष्या शबरी की कुटिया में पहुँचे। शबरी वर्षों से उनकी प्रतीक्षा कर रही थीं। लोक-परंपरा में चखे हुए बेरों की कथा जुड़ी है, जबकि रामचरितमानस में कंद-मूल-फल प्रेम से अर्पित करने का वर्णन है। भोजन के बाद राम ने शबरी से कहा कि वे उसे नवधा भक्ति बताएँगे। पर उससे पहले उन्होंने एक बात कही जो हर भक्ति-जिज्ञासु को याद रखनी चाहिए:

कह रघुपति सुनु भामिनि बाता। मानउँ एक भगति कर नाता॥ जाति पाँति कुल धर्म बड़ाई। धन बल परिजन गुन चतुराई॥ भगति हीन नर सोहइ कैसा। बिनु जल बारिद देखिअ जैसा॥रामचरितमानस, अरण्यकांड: मैं केवल एक भक्ति का ही नाता मानता हूँ; जाति, कुल, धन, बल और चतुराई, भक्ति के बिना ऐसे हैं जैसे बिना जल का बादल

इसके बाद आती हैं वे चौपाइयाँ, जिन्हें नवधा भक्ति का सबसे प्रसिद्ध हिंदी रूप माना जाता है:

नवधा भगति कहउँ तोहि पाहीं। सावधान सुनु धरु मन माहीं॥
प्रथम भगति संतन्ह कर संगा। दूसरि रति मम कथा प्रसंगा॥
गुर पद पंकज सेवा तीसरि भगति अमान। चौथि भगति मम गुन गन करइ कपट तजि गान॥
मंत्र जाप मम दृढ़ बिस्वासा। पंचम भजन सो बेद प्रकासा॥
छठ दम सील बिरति बहु करमा। निरत निरंतर सज्जन धरमा॥
सातवँ सम मोहि मय जग देखा। मोतें संत अधिक करि लेखा॥
आठवँ जथालाभ संतोषा। सपनेहुँ नहिं देखइ परदोषा॥
नवम सरल सब सन छलहीना। मम भरोस हियँ हरष न दीना॥
नव महुँ एकउ जिन्ह कें होई। नारि पुरुष सचराचर कोई॥
सोइ अतिसय प्रिय भामिनि मोरें। सकल प्रकार भगति दृढ़ तोरें॥रामचरितमानस, अरण्यकांड (शबरी-प्रसंग), गोस्वामी तुलसीदास
क्र.मानस की नवधा भक्तिसरल अर्थ
1संतों का संगसत्संग, यानी साधु-जनों की संगति
2कथा-प्रसंग में प्रेमराम की कथा में रुचि और रति
3गुरु-चरणों की सेवाअभिमान छोड़कर गुरु की सेवा
4गुण-गानकपट छोड़कर प्रभु के गुणों का गान
5मंत्र-जपदृढ़ विश्वास के साथ राम-मंत्र का जप
6दम, शील और वैराग्यइंद्रिय-संयम, अच्छा आचरण और सज्जनों के धर्म में निरंतर निष्ठा
7समदर्शनसारे जगत में राममय देखना, और संत को स्वयं राम से भी अधिक मानना
8संतोषजो मिले उसी में संतोष, और स्वप्न में भी दूसरे के दोष न देखना
9सरलतासबसे निश्छल व्यवहार, और प्रभु पर भरोसा, चाहे हर्ष न हो या दीनता

अब वह पंक्ति, जो इस पूरे लेख के प्रश्न का सबसे प्रामाणिक उत्तर है: "नव महुँ एकउ जिन्ह कें होई। नारि पुरुष सचराचर कोई॥ सोइ अतिसय प्रिय भामिनि मोरें।" यानी इन नौ में से केवल एक भी जिसके पास हो, चाहे वह स्त्री हो, पुरुष हो, या कोई भी जीव, वही राम को अत्यंत प्रिय है। नौ का पूरा बोझ उठाने की शर्त कहीं नहीं है।

जो ज़्यादातर लोग नहीं जानते

"नवधा भक्ति" दो अलग सूचियों का नाम है, और एक श्लोक ने हिरण्यकशिपु को क्रोधित कर दिया

पहली बात, जो बहुत से लोगों को चौंकाती है: भागवत की नवधा भक्ति और रामचरितमानस की नवधा भक्ति एक ही सूची नहीं हैं। दोनों में नौ-नौ रूप हैं, पर नाम और स्वभाव अलग हैं।

भागवत (प्रह्लाद)रामचरितमानस (शबरी)
श्रवण, कीर्तन, स्मरण, पादसेवन, अर्चन, वंदन, दास्य, सख्य, आत्मनिवेदनसंत-संग, कथा-प्रसंग, गुरु-सेवा, गुण-गान, मंत्र-जप, दम-शील-वैराग्य, समदर्शन, संतोष, सरलता
स्वरूप: साधन या क्रियाएँ, यानी भक्त क्या करता हैस्वरूप: साधन के साथ स्वभाव, यानी भक्त कैसा बनता है
यह सूची एक-एक कर्म पर टिकी हैइसकी अंतिम तीन कड़ियाँ (समदर्शन, संतोष, सरलता) पूरी तरह चरित्र की बातें हैं

दोनों सूचियाँ एक-दूसरे का विरोध नहीं करतीं, पूरक हैं। मानस की पहली चार कड़ियाँ (संत-संग, कथा, गुरु-सेवा, गुण-गान) भागवत के श्रवण, पादसेवन और कीर्तन से सीधे जुड़ती हैं, और पाँचवीं (मंत्र-जप) स्मरण की परंपरा से। पर मानस की अंतिम चार कड़ियाँ यह जोड़ती हैं कि भक्ति केवल करने की चीज़ नहीं, बनने की चीज़ है। भक्त जो करता है, वह धीरे-धीरे वही बन जाता है, यानी संतुष्ट, निश्छल और दूसरों के दोष न देखने वाला।

जिस श्लोक से भागवत की सबसे बड़ी कथा मुड़ी

दूसरी बात और भी नाटकीय है। जिस उत्तर में प्रह्लाद ने नवधा भक्ति गिनाई, वही उत्तर हिरण्यकशिपु के लिए असह्य बन गया। भागवत के अनुसार यह सुनते ही उसने क्रोध में बालक को गोद से नीचे पटक दिया, और आगे की पूरी कथा, यानी विष, अग्नि, हाथी और पर्वत से प्रह्लाद पर किए गए अत्याचार, और अंत में नरसिंह अवतार, इसी क्षण से शुरू होती है। यानी भक्ति के नौ रूपों की यह सूची कोई शांत उपदेश नहीं थी। वह एक पाँच वर्ष के बालक का वह साहसी उत्तर था जिसने पूरे युग की दिशा बदल दी।

भक्ति के और वर्गीकरण

भक्ति के आठ प्रकार कौन-से हैं? और बाक़ी गिनतियाँ

"भक्ति के आठ प्रकार" की खोज बहुत होती है, पर परंपरा में आठ का कोई एक मानक, शास्त्रीय वर्गीकरण नहीं मिलता। इंटरनेट पर जो आठ की सूचियाँ दिखती हैं, वे प्रायः नवधा में से किसी एक को हटाकर या जोड़कर बनी होती हैं। एक दूसरी ग़लतफ़हमी भी आम है: गौड़ीय परंपरा में तीव्र भक्ति के आठ सात्त्विक भाव गिनाए जाते हैं, जैसे कंप, अश्रु, रोमांच और स्वर-भंग। ये भक्ति के प्रकार नहीं, गहरी भक्ति के शारीरिक लक्षण हैं। परंपरा में जो वर्गीकरण सचमुच प्रसिद्ध हैं, वे ये हैं:

वर्गीकरणसंख्याकौन-से भेद
भागवत (7.5.23)9श्रवण से आत्मनिवेदन तक
रामचरितमानस (अरण्यकांड)9संत-संग से सरलता तक
नारद भक्ति सूत्र11गुण-माहात्म्य, रूप, पूजा, स्मरण, दास्य, सख्य, कांता, वात्सल्य, आत्मनिवेदन, तन्मयता और परम विरह की आसक्ति
गीता (7.16)4 प्रकार के भक्तआर्त, जिज्ञासु, अर्थार्थी, ज्ञानी
गौड़ीय परंपरा5 रसशांत, दास्य, सख्य, वात्सल्य, माधुर्य

इन सब वर्गीकरणों का सार एक ही है: भक्ति एक ही नदी है, पर उसके अनेक घाट हैं, और हर किसी को वही घाट सहज लगता है जो उसके स्वभाव के सबसे निकट हो।

समापन

तो नौ में से आपका रूप कौन-सा है?

उस रात जब सब चले गए, मैंने देखा कि परनानी अब भी वहीं बैठी थीं, हाथ जोड़े, आँखें बंद। मैंने पूछा, "आप क्या कर रही हैं?" उन्होंने आँखें खोले बिना कहा, "कुछ नहीं बेटा, बस दे रही हूँ।" उस समय मुझे समझ नहीं आया। आज समझ आता है कि वही सबसे पूरी भक्ति थी, और वही सबसे चुपचाप।

नवधा भक्ति नौ पायदानों की सीढ़ी नहीं है कि पहले से चढ़कर नौवीं तक पहुँचना ज़रूरी हो। वह नौ दरवाज़ों वाला एक ही घर है, जिसमें आप किसी भी दरवाज़े से भीतर आ सकते हैं। बस भीतर आइए। बाक़ी दरवाज़े, समय के साथ, अपने-आप खुलते जाते हैं।

भक्ति के जीवित रूप, जैसे कीर्तन, वंदन और अर्चन, देश के कई मंदिरों और तीर्थों में आज भी रोज़ देखे जा सकते हैं। मंदिर-परंपराओं के लिए हमारा Temple Guides संग्रह पढ़िए, और एकादशी तथा अन्य व्रतों की तिथियों के लिए आज का पंचांग देखिए।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)

नवधा भक्ति क्या है?

नवधा भक्ति भक्ति के नौ पारंपरिक रूप हैं। भागवत पुराण (7.5.23) में प्रह्लाद ने इन्हें श्रवण, कीर्तन, स्मरण, पादसेवन, अर्चन, वंदन, दास्य, सख्य और आत्मनिवेदन के रूप में गिनाया। रामचरितमानस में राम ने शबरी को नौ अलग रूप, संत-संग से सरलता तक, बताए हैं।

नवधा भक्ति के नौ प्रकार कौन-से हैं?

भागवत के अनुसार नवधा भक्ति के नौ प्रकार श्रवण (सुनना), कीर्तन (गाना), स्मरण (चिंतन), पादसेवन (चरण-सेवा), अर्चन (पूजन), वंदन (प्रणाम), दास्य (सेवक-भाव), सख्य (मित्र-भाव) और आत्मनिवेदन (पूर्ण समर्पण) हैं।

नवधा भक्ति का एक उदाहरण दीजिए

रामचरितमानस में शबरी को राम द्वारा नवधा भक्ति का उपदेश इसका सबसे सीधा उदाहरण है। भागवत की परंपरा में नौ आदर्श भक्त गिनाए जाते हैं: श्रवण में परीक्षित, कीर्तन में शुकदेव, स्मरण में प्रह्लाद, पादसेवन में लक्ष्मी, अर्चन में पृथु, वंदन में अक्रूर, दास्य में हनुमान, सख्य में अर्जुन और आत्मनिवेदन में बलि।

रामचरितमानस में नवधा भक्ति की चौपाई कौन-सी है?

रामचरितमानस के अरण्यकांड में शबरी-प्रसंग में "नवधा भगति कहउँ तोहि पाहीं" से आरंभ होने वाली चौपाइयाँ नवधा भक्ति का वर्णन करती हैं। इनमें नौ रूप क्रमशः संतों का संग, कथा-प्रसंग में प्रेम, गुरु-चरणों की सेवा, कपट-रहित गुण-गान, मंत्र-जप, दम-शील-वैराग्य, समदर्शन, संतोष और सरलता बताए गए हैं।

भागवत पुराण में नवधा भक्ति का श्लोक कौन-सा है?

श्रीमद्भागवत महापुराण (7.5.23-24) में प्रह्लाद का वचन है: "श्रवणं कीर्तनं विष्णोः स्मरणं पादसेवनम्। अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्यमात्मनिवेदनम्॥" इसके अगले श्लोक में वे कहते हैं कि इन नौ लक्षणों वाली भक्ति यदि पहले विष्णु को अर्पित होकर आचरण में लाई जाए, तो वही सर्वोत्तम विद्या है।

भक्ति के आठ प्रकार कौन-से हैं?

परंपरा में भक्ति के आठ प्रकारों का कोई एक मानक शास्त्रीय वर्गीकरण नहीं है। प्रसिद्ध वर्गीकरण नौ (नवधा भक्ति), ग्यारह (नारद भक्ति सूत्र), चार प्रकार के भक्त (गीता 7.16) और पाँच रस (गौड़ीय परंपरा) के हैं। आठ की सूचियाँ प्रायः नवधा में फेरबदल से बनी होती हैं, या गहरी भक्ति के आठ सात्त्विक भाव (कंप, अश्रु आदि) को भूल से प्रकार समझ लिया जाता है।

क्या हर भक्त का मार्ग अलग हो सकता है?

हाँ। गीता (4.11) कहती है कि जो जिस भाव से भजता है, ईश्वर उसे उसी भाव से भजते हैं, और गीता (7.16) चार अलग स्वभाव के भक्त गिनाती है। बारहवें अध्याय में भी कृष्ण साधक की क्षमता के अनुसार अलग-अलग विकल्प देते हैं। नवधा भक्ति के नौ रूप भी अलग-अलग स्वभावों के लिए अलग-अलग मार्ग हैं।

क्या नवधा भक्ति के नौ के नौ रूप अपनाना ज़रूरी है?

नहीं। रामचरितमानस में राम स्वयं कहते हैं कि इन नौ में से जिसके पास एक भी हो, चाहे वह स्त्री हो, पुरुष हो या कोई भी जीव, वह उन्हें अत्यंत प्रिय है। भागवत की परंपरा में भी हर आदर्श भक्त (जैसे परीक्षित, हनुमान, बलि) एक-एक रूप का प्रतीक माना जाता है।

भागवत और रामचरितमानस की नवधा भक्ति में क्या अंतर है?

दोनों में नौ-नौ रूप हैं, पर सूचियाँ अलग हैं। भागवत की सूची मुख्यतः साधन-रूप क्रियाओं (सुनना, गाना, पूजा करना आदि) की है, जबकि रामचरितमानस की सूची में साधन के साथ चरित्र के गुण, जैसे संतोष, समदर्शन और सरलता, भी शामिल हैं। दोनों एक-दूसरे की पूरक मानी जाती हैं।

अपने परिवार के "नौ लोगों" तक पहुँचाइए

अगर आपके घर में भी कोई सुनने वाला, कोई गाने वाला या कोई चुपचाप समर्पित भक्त है, तो यह लेख उन्हें भेजिए। रोज़ के छोटे शास्त्र-पाठ और भक्ति-परंपराएँ हम इन जगहों पर साझा करते हैं:

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यह लेख सनातन धर्म और भक्ति-परंपराओं के अंतर्गत शैक्षिक भाव से प्रस्तुत किया गया है। नानी के घर के पात्र उदाहरण के लिए गढ़े गए हैं। भक्ति की विधि और व्याख्या संप्रदाय और गुरु-परंपरा के अनुसार बदल सकती है; कृपया अपने गुरु या पारिवारिक परंपरा को प्राथमिकता दें।

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