कांचीपुरम, तमिलनाडु — पल्लव काल, सातवीं-आठवीं सदी
अट्ठावन छोटे मंदिर, अनगिनत शिव, एक ही प्रश्न
कांचीपुरम के कैलासनाथ मंदिर की परिक्रमा कीजिए, तो हर कुछ क़दम पर शिव का एक नया रूप सामने आता है — कहीं नृत्य करते, कहीं गंगा को जटा में थामते, कहीं त्रिपुर का संहार करते, कहीं परिवार के साथ बैठे। एक ही मंदिर में इतने शिव क्यों?
तमिलनाडु के प्राचीन नगर कांचीपुरम को भारत की सात मोक्षदायिनी पुरियों में गिना जाता है, और इसे "हज़ार मंदिरों का नगर" भी कहा जाता है। पर इन सबमें जो मंदिर सबसे पुराना माना जाता है, वह नगर के पश्चिमी छोर पर, शहर की भीड़ से थोड़ा हटकर, शांत खड़ा है — कैलासनाथ मंदिर। पल्लव राजा नरसिंहवर्मन द्वितीय, जिन्हें राजसिंह के नाम से अधिक जाना जाता है, ने इसे सातवीं सदी के अंत और आठवीं सदी के आरंभ में बनवाया था। बलुआ पत्थर से बना यह मंदिर दक्षिण भारत के प्रारंभिक संरचनात्मक (structural) मंदिरों में गिना जाता है।
इस मंदिर में प्रवेश करते ही एक अद्भुत अनुभव होता है। मुख्य मंदिर को घेरने वाली परिक्रमा-दीवार अपने आप में 58 छोटे-छोटे मंदिरों की एक शृंखला है। हर कक्ष में, और मुख्य विमान के चारों ओर बने उप-मंदिरों में, भगवान शिव का कोई न कोई रूप उकेरा गया है। कहीं वे दक्षिणामूर्ति बनकर ज्ञान दे रहे हैं, कहीं त्रिपुरांतक बनकर असुरों के तीन नगरों का विनाश कर रहे हैं, कहीं गंगाधर बनकर आकाश से उतरती गंगा को अपनी जटा में थाम रहे हैं, और लगभग हर ओर सोमास्कंद रूप में पार्वती और बाल स्कंद के साथ बैठे हैं।
स्वाभाविक प्रश्न उठता है: एक ही मंदिर में इतने शिव रूप क्यों दिखाई देते हैं? क्या यह केवल सजावट है? किसी राजा का वैभव-प्रदर्शन? या इसके पीछे कोई गहरा धार्मिक और दार्शनिक कारण है? इस लेख में हम इस मंदिर को एक संग्रहालय की दीर्घा की तरह पढ़ेंगे — पहले शिव के रूपों को पहचानेंगे, फिर समझेंगे कि वे यहाँ क्यों हैं।
संक्षेप में उत्तर: शैव परंपरा में शिव एक ही परम सत्य हैं, पर उनकी लीलाएँ अनेक हैं — संहार, अनुग्रह, नृत्य, ज्ञान और परिवार। आगम-परंपरा इन रूपों को "मूर्तियों" के रूप में वर्गीकृत करती है। कैलासनाथ मंदिर इन रूपों को एक परिक्रमा-पथ पर पत्थर में उकेरकर भक्त को शिव की पूरी कथा "पढ़ाता" है; साथ ही यह राजसिंह की गहरी शिव-भक्ति और पल्लव राजसत्ता की धार्मिक पहचान का भी प्रतीक है। नीचे हम इन सभी कारणों को विस्तार से खोलेंगे।
"एको देवः सर्वभूतेषु गूढः सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा।"
श्वेताश्वतर उपनिषद् 6.11 — एक ही देव सब प्राणियों में छिपा है, सर्वव्यापी, सबका अंतरात्माशिव-रूप दीर्घा: मंदिर में दिखने वाले प्रमुख रूप
शैव मूर्तिशास्त्र में शिव के रूपों को कई तरह से वर्गीकृत किया जाता है। समझने की सुविधा के लिए हमने कैलासनाथ मंदिर से जुड़े प्रमुख रूपों को पाँच भावों में बाँटा है: संहार (दुष्टों का विनाश), अनुग्रह (कृपा), नृत्य, परिवार और ज्ञान-रहस्य। नीचे किसी भाव पर टैप करके उस श्रेणी के रूप अलग से देखिए:
सोमास्कंद
शिव, उमा (पार्वती) और बीच में बाल स्कंद। गर्भगृह की पिछली दीवार पर और अनेक उप-मंदिरों में बार-बार दिखने वाला, पल्लव कला का सबसे प्रिय रूप।
दक्षिणामूर्ति
वटवृक्ष के नीचे बैठे मौन गुरु, जो ऋषियों को बिना बोले ज्ञान देते हैं। विमान के उप-मंदिरों में प्रमुख रूप।
त्रिपुरांतक
असुरों के तीन उड़ते नगरों — त्रिपुर — को एक ही बाण से भस्म करने वाले शिव; अहंकार के विनाश का प्रतीक।
गंगाधर
भगीरथ की प्रार्थना पर आकाश से उतरती गंगा के वेग को अपनी जटा में थामने वाले शिव — कृपा से संसार की रक्षा।
ऊर्ध्व ताण्डव
एक पैर ऊपर उठाए उग्र नृत्य करते शिव; पल्लव काल में नृत्यमूर्ति के प्रारंभिक भव्य रूपों में से एक।
कालसंहार (कालान्तक)
भक्त मार्कंडेय की रक्षा के लिए स्वयं काल, यानी यम, का दमन करने वाले शिव — मृत्यु पर विजय।
भिक्षाटन
भिक्षु रूप में वन में घूमते शिव, जिनके सौंदर्य से ऋषि-पत्नियाँ मोहित होती हैं; अहंकारी ऋषियों को विनम्रता सिखाने वाली लीला।
लिंगोद्भव
अनंत अग्नि-स्तंभ से प्रकट होते शिव, जिसका आदि-अंत ब्रह्मा और विष्णु भी नहीं खोज पाए — शिव की अनंतता का प्रतीक।
अर्धनारीश्वर
आधे शिव, आधी पार्वती — एक ही शरीर में पुरुष और प्रकृति, शिव और शक्ति की अभिन्नता।
रावणानुग्रह
कैलास उठाने का प्रयास करने वाले रावण को पैर के अँगूठे से दबाकर, फिर उसकी भक्ति पर प्रसन्न होकर वर देने वाले शिव।
नृत्यरत शिव के अन्य रूप
दीवारों पर नृत्य की विभिन्न मुद्राओं में शिव, जो पल्लव कला में नृत्य और भक्ति के घनिष्ठ संबंध को दर्शाते हैं।
शिवलिंग (निष्कल-सकल रूप)
गर्भगृह और अनेक लघु मंदिरों में प्रतिष्ठित लिंग — वह रूप जो आकार और निराकार के बीच का सेतु है।
यह दीर्घा मंदिर से जुड़े प्रमुख और प्रामाणिक रूप से वर्णित रूपों का चयन है, संपूर्ण सूची नहीं। कुछ स्रोत यहाँ शिव के 64 रूपों तक की बात करते हैं; हर रूप की सटीक पहचान और स्थान के लिए विशेषज्ञ प्रलेखन देखना उचित है।
इस दीर्घा को देखकर पहली बात यह स्पष्ट होती है कि ये रूप अलग-अलग देवता नहीं, बल्कि एक ही शिव की अलग-अलग लीलाएँ हैं। हर रूप शिव के किसी एक गुण को केंद्र में रखता है — कहीं उनकी शक्ति, कहीं करुणा, कहीं ज्ञान, कहीं प्रेम। जब ये सब एक परिक्रमा-पथ पर एक साथ आते हैं, तो वे शिव का एक संपूर्ण "चरित्र-चित्र" बन जाते हैं।
"रुचीनां वैचित्र्यादृजुकुटिलनानापथजुषां नृणामेको गम्यस्त्वमसि पयसामर्णव इव॥"
पुष्पदंत, शिवमहिम्न स्तोत्र, श्लोक 7 — रुचियों की भिन्नता से सीधे-टेढ़े अनेक मार्गों पर चलने वाले मनुष्यों के एकमात्र लक्ष्य तुम हो, जैसे सारी नदियों का लक्ष्य समुद्रइतने शिव क्यों? चार कारण
अब मुख्य प्रश्न पर आते हैं। कैलासनाथ मंदिर में शिव के इतने रूप एक साथ क्यों उकेरे गए? इसका कोई एक उत्तर नहीं है; कई कारण मिलकर इस अद्भुत मूर्ति-कार्यक्रम को समझाते हैं।
धर्मशास्त्रीय कारण: एक शिव, अनेक लीलाएँ
शैव आगम-परंपरा में शिव के अनेक मूर्ति-रूपों का वर्णन है, जिनकी संख्या अलग-अलग ग्रंथों में पच्चीस "माहेश्वर मूर्तियों" से लेकर चौंसठ तक बताई जाती है। हर रूप एक पौराणिक कथा और एक आध्यात्मिक सत्य से जुड़ा है। मंदिर इन रूपों को एक साथ दिखाकर शिव की संपूर्णता का दर्शन कराता है।
शिक्षण का कारण: पत्थर का ग्रंथ
उस युग में अधिकांश लोग ग्रंथ नहीं पढ़ सकते थे। मंदिर की दीवारें उनके लिए एक खुली पुस्तक थीं। परिक्रमा करते भक्त हर कक्ष में एक नई कथा "पढ़ते" थे — गंगावतरण, त्रिपुर-दहन, मार्कंडेय की रक्षा, रावण का अहंकार। मंदिर एक पत्थर का पुराण बन गया।
भक्ति का कारण: राजसिंह की शिव-निष्ठा
राजसिंह एक गहरे शिवभक्त माने जाते हैं, और यह मंदिर उनकी व्यक्तिगत आराधना से जुड़ा था। मंदिर का मूल नाम ही "राजसिंह पल्लवेश्वर" था। अपने आराध्य के हर रूप को पत्थर में अमर करना उस भक्ति का स्वाभाविक रूप था।
राजसत्ता का कारण: सोमास्कंद और राजपरिवार
कई कला-इतिहासकार मानते हैं कि पल्लव कला में सोमास्कंद — शिव, उमा और बाल स्कंद — की बार-बार उपस्थिति राजपरिवार (राजा, रानी, युवराज) की दैवी आदर्श-छवि से भी जुड़ी थी। यह एक विद्वत्तापूर्ण व्याख्या है, निश्चित तथ्य नहीं, पर रोचक है।
सोमास्कंद: पल्लवों का सबसे प्रिय शिव
इन सभी रूपों में सोमास्कंद का विशेष स्थान है। "सोमास्कंद" शब्द "स-उमा-स्कंद" से बना माना जाता है — यानी उमा और स्कंद के साथ शिव। इस रूप में शिव एक शांत, स्नेही गृहस्थ के रूप में दिखते हैं: पार्वती उनके बगल में, और उनके बीच बालक स्कंद (कार्तिकेय/मुरुगन)। कैलासनाथ मंदिर के गर्भगृह में शिवलिंग के पीछे की दीवार पर सोमास्कंद का उकेरा हुआ फलक है, और प्रवेश के पास के छोटे मंदिरों में भी यही रूप बार-बार दिखता है। महाबलीपुरम के प्रसिद्ध तट मंदिर में भी सोमास्कंद प्रमुख रूप है।
यह बात ध्यान देने योग्य है: जिस मंदिर में शिव के सबसे उग्र रूप — त्रिपुरांतक, कालसंहार — भी हैं, उसी मंदिर का केंद्र एक पारिवारिक, स्नेहमय रूप है। मानो मंदिर कह रहा हो कि शिव का संहार भी अंततः उसी प्रेम और संरक्षण के लिए है जो एक परिवार में होता है। शिव और शक्ति के इस अभिन्न संबंध पर तमिल संत-कवि की सबसे सुंदर पंक्ति यही है कि "प्रेम ही शिव है"।
"मनोबुद्ध्यहंकारचित्तानि नाहं… चिदानन्दरूपः शिवोऽहम् शिवोऽहम्॥"
आदि शंकराचार्य, निर्वाण षट्कम् — मैं मन, बुद्धि, अहंकार या चित्त नहीं; मैं चिदानंद-स्वरूप शिव हूँलिंग और मूर्ति: निराकार और साकार साथ-साथ
कैलासनाथ मंदिर में एक और रोचक बात दिखती है: गर्भगृह में शिवलिंग है, पर उसके ठीक पीछे दीवार पर सोमास्कंद की मानवाकार मूर्ति भी है। यानी एक ही स्थान पर शिव के दो प्रकार के रूप साथ-साथ हैं। शैव दर्शन इसे बहुत सुंदर ढंग से समझाता है। उसके अनुसार शिव के तीन स्तर हैं: निष्कल — पूर्णतः निराकार, जिसे किसी रूप में नहीं बाँधा जा सकता; सकल — साकार, जैसे नटराज, दक्षिणामूर्ति या सोमास्कंद की मूर्तियाँ; और इन दोनों के बीच सकल-निष्कल — यानी शिवलिंग, जो न पूरी तरह निराकार है, न पूरी तरह मानवाकार।
इस दृष्टि से देखें तो कैलासनाथ का पूरा मूर्ति-कार्यक्रम इन तीनों स्तरों की एक सीढ़ी है। बाहर की दीवारों पर अनेक साकार रूप हैं, जो भक्त की कल्पना और भावना को पकड़ते हैं। भीतर गर्भगृह में शिवलिंग है, जो साकार और निराकार के बीच का सेतु है। और उसके भी परे वह निराकार शिव है, जिसे कोई मूर्ति पूरी तरह नहीं दिखा सकती। भक्त जितना भीतर जाता है, रूप उतने ही कम होते जाते हैं और अर्थ उतना ही गहरा। यही कारण है कि इतने रूपों की उपस्थिति शिव को "बाँटती" नहीं, बल्कि भक्त को धीरे-धीरे उस एक तक ले जाती है जो सभी रूपों से परे है।
लिंगोद्भव का रूप — अनंत अग्नि-स्तंभ से प्रकट होते शिव — इसी विचार की कथा है: ब्रह्मा और विष्णु जिस स्तंभ का आदि और अंत खोजने निकले, वह अनंत था, और उसी से शिव प्रकट हुए। यह कथा बताती है कि सारे रूप उसी अनंत से निकलते हैं और उसी में लौटते हैं। भगवान विष्णु के अवतारों की परंपरा से इसकी तुलना के लिए हमारा लेख दशावतार रोचक पाठ है।
परिक्रमा: मंदिर को उसी क्रम में देखिए जैसे भक्त देखता है
कैलासनाथ मंदिर के शिव-रूपों को समझने का सबसे अच्छा तरीका है उन्हें उसी क्रम में देखना जिसमें एक भक्त उनसे मिलता है। मंदिर की योजना ही एक आध्यात्मिक यात्रा की तरह बनी है:
- प्रवेश-द्वार और अगले छोटे मंदिर
मंदिर के सामने और प्रवेश के पास छोटे मंदिरों की एक पंक्ति है, जिनमें से कई में शिवलिंग और पीछे सोमास्कंद फलक है। कुछ विवरणों के अनुसार इनमें से कुछ मंदिर राजसिंह की रानी रंगपताका ने बनवाए थे।
- परिक्रमा-दीवार के 58 लघु मंदिर
मुख्य प्रांगण को घेरने वाली दीवार में बने छोटे-छोटे कक्ष, हर एक में शिव या शैव परिवार का कोई रूप। इनकी नींव के पास राजसिंह की लगभग ढाई सौ उपाधियाँ (बिरुद) पल्लव ग्रंथ लिपि में उकेरी बताई जाती हैं।
- सिंह-स्तंभ
प्रांगण के स्तंभों के आधार पर पिछले पैरों पर खड़े, उछलते सिंह (व्याल) — राजसिंह शैली की पहचान। राजा का नाम ही "राजसिंह" था, और सिंह उनकी कला का हस्ताक्षर बन गया।
- मुख्य विमान और उसके सात उप-मंदिर
गर्भगृह के ऊपर उठता पिरामिडनुमा विमान, जिसके चारों ओर उप-मंदिरों में दक्षिणामूर्ति, भिक्षाटन, त्रिपुरांतक, कालसंहार, गंगाधर और ऊर्ध्व ताण्डव जैसे भव्य रूप हैं।
- संकरा परिक्रमा-मार्ग
गर्भगृह के चारों ओर एक संकरा मार्ग है, जिसमें प्रवेश के लिए भक्त को झुककर, लगभग रेंगते हुए जाना पड़ता है, और निकलने का मार्ग भी उतना ही संकरा है। परंपरा इसे जन्म, जीवन और पुनर्जन्म की यात्रा का प्रतीक मानती है।
- गर्भगृह
अंत में, शिवलिंग और उसके पीछे सोमास्कंद — सारी कथाओं, सारे रूपों के बाद, वही एक शिव।
यह क्रम अपने आप में एक उत्तर है। भक्त बाहर से भीतर की ओर आता है — अनेक रूपों से एक की ओर। परिक्रमा-दीवार के 58 मंदिर मानो शिव के अनेक रूपों की "भीड़" हैं, और गर्भगृह उस भीड़ के केंद्र में बैठा एक मौन सत्य। अनेकता से एकता तक की यही यात्रा इस मंदिर का सबसे गहरा दर्शन है।
संकरे मार्ग के बारे में: परिक्रमा-मार्ग बहुत संकरा है और उसमें झुककर चलना पड़ता है। बुज़ुर्ग, घुटनों की समस्या वाले या बंद जगह से असहज होने वाले यात्री इसका प्रयास सावधानी से करें या न करें। मंदिर का अनुभव बाकी परिसर से भी पूरी तरह लिया जा सकता है। पहुँच के वर्तमान नियम मंदिर में ही जान लें।
पूसलार की कथा: जब शिव ने राजा का मंदिर छोड़ा
कैलासनाथ मंदिर से जुड़ी सबसे सुंदर कथा इसकी दीवारों में नहीं, तमिल शैव संतों की जीवनियों में है। बारहवीं सदी के ग्रंथ पेरिय पुराणम् में 63 नायनमार संतों की कथाएँ हैं, और उनमें से एक हैं पूसलार नायनार। परंपरा के अनुसार पूसलार एक निर्धन भक्त थे जो शिव के लिए मंदिर बनाना चाहते थे, पर उनके पास धन नहीं था। इसलिए उन्होंने अपने मन में ईंट-दर-ईंट, पूरे विधि-विधान से एक मंदिर बनाया, और उसकी प्रतिष्ठा का एक शुभ दिन तय किया।
संयोग से उसी दिन पल्लव राजा अपने भव्य पत्थर के मंदिर — जिसे परंपरा इसी कैलासनाथ से जोड़ती है — की प्रतिष्ठा करने वाले थे। कथा कहती है कि उससे पहले की रात शिव राजा के स्वप्न में आए और बोले कि वे अगले दिन नहीं आ पाएँगे, क्योंकि उन्हें पूसलार के मंदिर की प्रतिष्ठा में जाना है। राजा चकित होकर पूसलार को खोजने निकले, और पाया कि वह "मंदिर" केवल एक निर्धन भक्त के हृदय में बना था। राजा ने उस भक्त के चरणों में प्रणाम किया, और फिर अपने मंदिर की प्रतिष्ठा दूसरे दिन की।
यह कथा इस लेख के प्रश्न को एक नई गहराई देती है। कैलासनाथ में शिव के अनगिनत रूप पत्थर में उकेरे गए हैं — पर पूसलार की कथा याद दिलाती है कि शिव का सबसे प्रिय रूप वह है जो भक्त के मन में बनता है। पत्थर के सारे रूप अंततः उसी भीतरी मंदिर की ओर इशारा करते हैं।
"धनी शिव के लिए मंदिर बनवाएँगे; मैं निर्धन क्या करूँ? मेरे पैर ही स्तंभ हैं, शरीर ही मंदिर, और सिर ही उसका स्वर्ण-कलश।"
बसवण्णा के एक प्रसिद्ध कन्नड़ वचन का भावानुवाद (बारहवीं सदी)भक्ति के इसी भीतरी स्वरूप पर हमारे लेख भक्ति के नौ रूप और नाम जप को इतना शक्तिशाली क्यों माना गया सुंदर साथी पाठ हैं।
एक मंदिर, जिसने शत्रु को भी प्रशंसक बना दिया
कैलासनाथ मंदिर की कलात्मक शक्ति का सबसे बड़ा प्रमाण इतिहास की एक अद्भुत घटना है। राजसिंह के कुछ दशक बाद, पल्लवों के प्रतिद्वंद्वी चालुक्य राजा विक्रमादित्य द्वितीय ने कांचीपुरम पर अधिकार किया। विभिन्न विवरणों के अनुसार वे इस मंदिर के सौंदर्य से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने इसे नुकसान नहीं पहुँचाया, बल्कि दान दिए, और मंदिर के एक स्तंभ पर उनका कन्नड़ शिलालेख आज भी देखा जा सकता है। इतिहासकार यह भी मानते हैं कि कर्नाटक के पट्टदकल में बना विरूपाक्ष मंदिर कई पहलुओं में कैलासनाथ से प्रेरित है।
पल्लव राजा नरसिंहवर्मन द्वितीय (राजसिंह) द्वारा निर्माण; बाद में उनके पुत्र महेंद्रवर्मन तृतीय द्वारा अगला भाग पूरा करने का उल्लेख।
चालुक्य राजा विक्रमादित्य द्वितीय का कांचीपुरम पर अधिकार; मंदिर को दान और स्तंभ पर कन्नड़ शिलालेख।
पट्टदकल के विरूपाक्ष मंदिर पर कैलासनाथ की प्रेरणा, विद्वानों के अनुसार।
महान चोल सम्राट राजराज चोल द्वारा भी यहाँ एक शिलालेख छोड़ने का उल्लेख मिलता है; तंजावुर के बृहदेश्वर पर पल्लव परंपरा की छाप मानी जाती है।
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा संरक्षित स्मारक; कांचीपुरम का सबसे पुराना जीवित मंदिर।
"कैलासनाथ" नाम भी रोचक है। मंदिर का मूल नाम "राजसिंह पल्लवेश्वर" था। बाद का लोकप्रिय नाम एक शिलालेख से निकला माना जाता है जो इसके ऊँचे विमान को शिव के निवास कैलास तक पहुँचता हुआ बताता है।
चित्रों के अवशेष
पत्थर की मूर्तियों के अलावा, मंदिर में कभी भित्तिचित्र भी थे, जिनके कुछ अवशेष आज भी देखे जा सकते हैं। विद्वान इनकी शैली को अजंता के चित्रों और कांचीपुरम के ही वैकुंठ पेरुमाल मंदिर के चित्रों से मिलती-जुलती बताते हैं। यानी कैलासनाथ कभी केवल पत्थर का नहीं, बल्कि रंगों का भी मंदिर था। पास का वैकुंठ पेरुमाल मंदिर, जो विष्णु को समर्पित है, भी राजसिंह के समय या उसके आसपास का है — कांचीपुरम को "शिव-विष्णु कांची" यूँ ही नहीं कहा जाता।
भारत की विविध मंदिर-वास्तुकला की झलक के लिए सोमनाथ मंदिर और मितावली का गोल मंदिर देखिए, और शिव के प्रमुख तीर्थों के लिए 12 ज्योतिर्लिंगों की संपूर्ण जानकारी।
दीवारों पर कहानियाँ: तीन रूप, तीन शिक्षाएँ
शिव के इन रूपों को केवल पहचानना काफ़ी नहीं; हर रूप की अपनी शिक्षा है। तीन उदाहरण देखिए:
गंगाधर: शक्ति को थामने की कला
राजा भगीरथ की तपस्या से गंगा पृथ्वी पर उतरने को तैयार हुईं, पर उनका वेग इतना प्रचंड था कि पृथ्वी उसे सह नहीं सकती थी। तब शिव ने गंगा को अपनी जटा में थाम लिया और उन्हें धीरे-धीरे धरती पर छोड़ा। यह रूप सिखाता है कि सच्ची शक्ति केवल विनाश में नहीं, बल्कि प्रचंड शक्ति को सँभालकर उसे कल्याणकारी बनाने में है।
रावणानुग्रह: अहंकार से भक्ति तक
रावण ने अपने बल के अहंकार में कैलास पर्वत को उठाने का प्रयास किया। शिव ने केवल पैर का अँगूठा दबाया, और रावण पर्वत के नीचे दब गया। तब रावण ने शिव की स्तुति की, और शिव ने प्रसन्न होकर उसे वर दिया। यह रूप एक साथ दो बातें कहता है: अहंकार का दमन, और पश्चाताप पर कृपा। राम की कथा में रावण का पूरा चरित्र हमारे लेख श्रीराम की संपूर्ण कथा में पढ़िए।
दक्षिणामूर्ति: मौन का उपदेश
वटवृक्ष के नीचे बैठे युवा गुरु, और उनके सामने वृद्ध ऋषि। गुरु कुछ बोलते नहीं, फिर भी ऋषियों के सारे संशय मिट जाते हैं। यह रूप सिखाता है कि सबसे गहरा ज्ञान शब्दों से परे है। आदि शंकराचार्य का प्रसिद्ध दक्षिणामूर्ति स्तोत्र इसी रूप की स्तुति है।
"शिव का नृत्य किसी भी कला या धर्म द्वारा प्रस्तुत ईश्वर की सक्रियता की सबसे स्पष्ट छवि है।"
आनंद के. कुमारस्वामी, "द डांस ऑफ़ शिवा" (1918) के भाव पर आधारितइन सभी रूपों में एक ही शिव हैं, पर हर रूप जीवन के किसी अलग प्रश्न का उत्तर देता है — शक्ति को कैसे सँभालें, अहंकार से कैसे मुक्त हों, ज्ञान कैसे पाएँ, मृत्यु के भय को कैसे जीतें। कैलासनाथ मंदिर इन सब उत्तरों को एक ही परिक्रमा-पथ पर रख देता है। हिंदू देवी-देवताओं के व्यापक परिवार को समझने के लिए हमारी हिंदू देवी-देवताओं की संपूर्ण गाइड देखिए।
लोग यह भी पूछते हैं
कैलासनाथ मंदिर किसने बनवाया?
पल्लव राजा नरसिंहवर्मन द्वितीय (राजसिंह) ने, लगभग 685–705 ई. के बीच। अगला भाग उनके पुत्र महेंद्रवर्मन तृतीय के समय पूरा होने का उल्लेख मिलता है।
कैलासनाथ मंदिर में कितने छोटे मंदिर हैं?
परिक्रमा-दीवार में 58 लघु मंदिर हैं, जिनमें शिव के विभिन्न रूप उकेरे गए हैं।
सोमास्कंद क्या है?
शिव, उमा (पार्वती) और बाल स्कंद का एक साथ पारिवारिक रूप, जो पल्लव कला का सबसे प्रिय विषय है।
कैलासनाथ मंदिर किस पत्थर से बना है?
यह मंदिर मुख्यतः बलुआ पत्थर से बना है, जिस पर बारीक नक्काशी की गई है।
कैलासनाथ मंदिर का संकरा मार्ग क्या दर्शाता है?
गर्भगृह के चारों ओर का संकरा परिक्रमा-मार्ग परंपरा में जन्म, जीवन और पुनर्जन्म की यात्रा का प्रतीक माना जाता है।
कांचीपुरम का सबसे पुराना मंदिर कौन-सा है?
कैलासनाथ मंदिर को कांचीपुरम का सबसे पुराना जीवित मंदिर माना जाता है।
कैलासनाथ मंदिर यात्रा गाइड
कांचीपुरम चेन्नई से एक आसान दिन-यात्रा है। नीचे की जानकारी उपयोगी होगी; समय और नियमों की स्थानीय पुष्टि अवश्य करें।
कांचीपुरम नगर का पश्चिमी भाग, तमिलनाडु
लगभग 75 किमी; सड़क से लगभग 2 घंटे
चेन्नई अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा
कांचीपुरम रेलवे स्टेशन
नवंबर से फ़रवरी; सुबह की रोशनी
वैकुंठ पेरुमाल, एकाम्बरेश्वर, कामाक्षी अम्मन मंदिर
दर्शन के समय ध्यान रखें
बलुआ पत्थर की नक्काशी नाज़ुक है और समय के साथ घिसी हुई है — मूर्तियों को छूने से बचें। 58 लघु मंदिरों के छोटे, अंधेरे कक्षों में मूर्तियाँ ठीक से देखने के लिए एक छोटी टॉर्च बहुत काम आती है। परिक्रमा धीरे-धीरे कीजिए और हर कक्ष में रुककर पहचानने का प्रयास कीजिए कि शिव का कौन-सा रूप सामने है — यही इस मंदिर का असली आनंद है। यह एक जीवित पूजा-स्थल है, इसलिए शालीन वस्त्र और मर्यादा बनाए रखें, और फ़ोटोग्राफ़ी के नियमों का पालन करें। कांचीपुरम में महाबलीपुरम (लगभग 65 किमी) को जोड़कर पल्लव कला की पूरी यात्रा बनाई जा सकती है, जहाँ तट मंदिर और पंच रथ हैं।
दक्षिण भारत के अन्य मंदिरों की यात्रा-योजना के लिए हमारी टेंपल गाइड्स श्रृंखला और मंदिर श्रृंखला देखिए।
पल्लव कांची से प्रेरित चुनी हुई वस्तुएँ
कांचीपुरम का विश्व-प्रसिद्ध रेशम, महाबलीपुरम का पत्थर-शिल्प, शिव-मूर्तिशास्त्र और नायनमारों पर क्लासिक ग्रंथ — इस लेख की दीर्घा से जुड़ा संग्रह।
कांजीवरम रेशमी स्टोल / साड़ी (GI-टैग)
कांचीपुरम का शुद्ध शहतूत रेशम, जिसकी किनारी पर प्रायः मंदिर-शिखर और पौराणिक रूपांकन बुने जाते हैं। नगर की सबसे प्रसिद्ध धरोहर।
Amazon पर देखेंहस्त-तराशी पत्थर की शिव / सोमास्कंद प्रतिमा
पल्लव मूर्ति-परंपरा के गढ़ महाबलीपुरम के शिल्पियों द्वारा तराशी गई प्रतिमा। कैलासनाथ और तट मंदिर की कला-धारा को घर तक लाने वाली वस्तु।
Amazon पर देखें"Elements of Hindu Iconography" — टी. ए. गोपीनाथ राव
शिव के अनेक मूर्ति-रूपों की पहचान और उनके शास्त्रीय आधार पर सबसे प्रामाणिक क्लासिक ग्रंथों में से एक। इस लेख की दीर्घा को गहराई से समझने के लिए।
Amazon पर देखें"The Dance of Shiva" — आनंद के. कुमारस्वामी
भारतीय कला और दर्शन पर निबंधों का क्लासिक संग्रह, जिसका नटराज पर लिखा निबंध विश्व-प्रसिद्ध है। शिव-रूपों के दार्शनिक अर्थ के लिए।
Amazon पर देखेंपेरिय पुराणम् (सेक्किलार) का अनुवाद
63 नायनमार शैव संतों की जीवन-कथाएँ, जिनमें पूसलार की "मन के मंदिर" वाली अमर कथा भी है। अंग्रेज़ी या हिंदी अनुवाद संस्करण देखें।
Amazon पर देखेंकॉम्पैक्ट रिचार्जेबल LED टॉर्च
छोटे, अंधेरे गर्भगृहों और लघु मंदिरों में मूर्तियों को साफ़ देखने के लिए हल्की, गर्म-रोशनी वाली टॉर्च। हर प्राचीन मंदिर-यात्रा में काम आने वाली वस्तु।
Amazon पर देखेंप्रकटीकरण: इस अनुभाग में एफ़िलिएट लिंक हैं। इनके माध्यम से खरीदारी करने पर Moonlit Sanatan को बिना किसी अतिरिक्त लागत के एक छोटा कमीशन मिल सकता है।
उपसंहार: अनेक रूपों से एक की ओर
तो, एक ही मंदिर में इतने शिव रूप क्यों दिखाई देते हैं? क्योंकि शैव परंपरा में शिव एक होकर भी अनंत लीलाओं वाले हैं — संहारक भी, कृपालु भी, नर्तक भी, गुरु भी और गृहस्थ भी। क्योंकि मंदिर की दीवारें उस युग में भक्तों के लिए पत्थर का पुराण थीं। क्योंकि राजसिंह की शिव-भक्ति अपने आराध्य के हर रूप को अमर करना चाहती थी। और क्योंकि सोमास्कंद के रूप में शिव का पारिवारिक रूप शायद पल्लव राजसत्ता के आदर्श से भी जुड़ा था।
पर सबसे गहरा उत्तर मंदिर की बनावट में ही है। भक्त बाहर की 58 कोठरियों से होकर, अनेक रूपों को देखते हुए, संकरे मार्ग से गुज़रकर, अंततः गर्भगृह के एक शिवलिंग तक पहुँचता है। अनेकता से एकता की यह यात्रा ही कैलासनाथ का दर्शन है। और पूसलार की कथा याद दिलाती है कि इस यात्रा का अंतिम पड़ाव पत्थर का गर्भगृह नहीं, भक्त का अपना हृदय है।
अगली बार जब आप कांचीपुरम जाएँ, तो रेशम की दुकानों और भीड़ भरे मंदिरों से थोड़ा हटकर, नगर के पश्चिमी छोर पर इस शांत बलुआ पत्थर के मंदिर तक जाइए। हर कोठरी में रुककर पूछिए — यह कौन-सा शिव है, और यह मुझसे क्या कह रहा है?
शिव और मंदिरों की और कहानियाँ
Moonlit Sanatan पर भारत के प्राचीन मंदिरों, उनकी कला और सनातन दर्शन की शोधपूर्ण कहानियाँ।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
कैलासनाथ मंदिर कहाँ स्थित है?
कैलासनाथ मंदिर तमिलनाडु के कांचीपुरम नगर के पश्चिमी भाग में स्थित है। यह चेन्नई से लगभग 75 किलोमीटर दूर है।
कैलासनाथ मंदिर किसने और कब बनवाया?
यह मंदिर पल्लव राजा नरसिंहवर्मन द्वितीय, जिन्हें राजसिंह कहा जाता है, ने लगभग 685–705 ई. के बीच बनवाया। इसका मूल नाम "राजसिंह पल्लवेश्वर" था।
कैलासनाथ मंदिर में शिव के इतने रूप क्यों हैं?
शैव परंपरा में शिव की अनेक लीलाएँ — संहार, अनुग्रह, नृत्य, ज्ञान और परिवार — अलग-अलग मूर्ति-रूपों में व्यक्त होती हैं। मंदिर इन रूपों को परिक्रमा-पथ पर उकेरकर भक्तों को शिव की संपूर्ण कथा दिखाता है; यह राजसिंह की शिव-भक्ति और पल्लव राजसत्ता की धार्मिक पहचान का भी प्रतीक है।
कैलासनाथ मंदिर में शिव के कौन-कौन से रूप दिखते हैं?
प्रमुख रूपों में सोमास्कंद, दक्षिणामूर्ति, त्रिपुरांतक, गंगाधर, ऊर्ध्व ताण्डव, कालसंहार, भिक्षाटन, लिंगोद्भव, अर्धनारीश्वर और रावणानुग्रह शामिल हैं।
सोमास्कंद रूप का क्या महत्व है?
सोमास्कंद में शिव, उमा (पार्वती) और बाल स्कंद एक साथ दिखते हैं। यह पल्लव कला का सबसे प्रिय रूप है और कैलासनाथ मंदिर के गर्भगृह की पिछली दीवार पर भी उकेरा गया है।
कैलासनाथ मंदिर का संकरा परिक्रमा-मार्ग क्या है?
गर्भगृह के चारों ओर एक संकरा मार्ग है, जिसमें झुककर, लगभग रेंगते हुए प्रवेश करना पड़ता है। परंपरा इसे जन्म, जीवन और पुनर्जन्म की यात्रा का प्रतीक मानती है।
चालुक्य राजा विक्रमादित्य द्वितीय का इस मंदिर से क्या संबंध है?
कांचीपुरम पर अधिकार करने के बाद चालुक्य राजा विक्रमादित्य द्वितीय इस मंदिर के सौंदर्य से प्रभावित हुए, उन्होंने दान दिए और एक स्तंभ पर उनका कन्नड़ शिलालेख है। विद्वानों के अनुसार पट्टदकल का विरूपाक्ष मंदिर भी कैलासनाथ से प्रेरित है।
पूसलार नायनार की कथा क्या है?
पेरिय पुराणम् के अनुसार निर्धन भक्त पूसलार ने अपने मन में शिव का मंदिर बनाया था। परंपरा कहती है कि शिव ने पल्लव राजा के भव्य मंदिर की प्रतिष्ठा के बजाय पहले पूसलार के मन के मंदिर में जाना चुना, जिससे राजा ने भक्त की महानता को पहचाना।