कुमारी पहाड़ी, ऋषिकुल्या नदी तट, गंजाम, ओडिशा
एक पहाड़ी, दो बहनें, एक आदिशक्ति
दक्षिण ओडिशा की एक हरी पहाड़ी पर, नदी के ऊपर, दो देवियाँ साथ-साथ विराजती हैं — तारा और तारिणी। भक्त उन्हें बहनें कहते हैं, तंत्र उन्हें आदिशक्ति के दो रूप, और प्राचीन कलिंग के नाविक उन्हें समुद्र-यात्रा की रक्षिका मानते थे।
ओडिशा के गंजाम ज़िले में, ब्रह्मपुर (बरहमपुर) शहर से लगभग 28–30 किलोमीटर दूर, पुरुषोत्तमपुर के पास एक पहाड़ी है जिसे लोग कुमारी पहाड़ी या तारा तारिणी पहाड़ कहते हैं। इसके नीचे शांत भाव से ऋषिकुल्या नदी बहती है, और इसकी चोटी पर खड़ा है तारा तारिणी मंदिर। गर्भगृह में किसी एक देवी की नहीं, बल्कि दो देवियों की पूजा होती है, जिनके चेहरे मानवाकार हैं, और जिन्हें स्थानीय लोग स्नेह से "दो बहनें" कहते हैं।
पहली बार यह सुनने वाले के मन में कई प्रश्न उठते हैं। ये दो बहनें कौन हैं? क्या ये सचमुच दो अलग देवियाँ हैं, या एक ही शक्ति के दो रूप? इन्हें शक्तिपीठ क्यों माना जाता है? और भारतीय नौसेना ने अपनी उस नौका का नाम इनके नाम पर क्यों रखा, जिस पर सवार होकर भारतीय महिला अधिकारियों ने पूरी पृथ्वी की परिक्रमा की?
इन प्रश्नों का उत्तर खोजने के लिए हम इस लेख में एक तीर्थयात्री की तरह नदी तट से पहाड़ी की चोटी तक चढ़ेंगे। हर पड़ाव पर एक नई परत खुलेगी — और हर परत में, जैसे इस मंदिर में, दो पहलू साथ-साथ चलेंगे।
"तारा" और "तारिणी": दो नाम, एक ही अर्थ की दो छायाएँ
किसी भी देवी को समझने का पहला द्वार उसका नाम होता है। संस्कृत में "तारा" और "तारिणी" दोनों "तॄ" धातु से जुड़े माने जाते हैं, जिसका अर्थ है पार उतारना, तारना। यानी तारा वह हैं जो संसार-सागर से पार उतारती हैं, और तारिणी वह जो रक्षा करके पार ले जाती हैं। एक और सुंदर संयोग यह है कि संस्कृत में "तारिणी" शब्द का अर्थ नौका भी बताया जाता है — वह जो नदी या समुद्र के पार ले जाए।
अब इस नाम को उस भूगोल के साथ रखिए जहाँ यह मंदिर खड़ा है: एक नदी के ठीक ऊपर, समुद्र-तट से बहुत दूर नहीं, उस क्षेत्र में जो कभी प्राचीन कलिंग के समुद्री व्यापार का हिस्सा था। नाम, स्थान और अर्थ — तीनों एक ही दिशा में इशारा करते हैं: पार उतारने वाली माँ।
तारा
दस महाविद्याओं में दूसरी महाविद्या के रूप में भी तारा का नाम आता है — वह शक्ति जो ज्ञान के प्रकाश से अंधकार से पार ले जाती है। तंत्र-परंपरा में तारा को करुणा और उग्रता दोनों का संगम माना गया है।
तारिणी
ओडिशा की लोक-आस्था में "माँ तारिणी" संकट से उबारने वाली, यात्रियों और नाविकों की रक्षा करने वाली देवी के रूप में अत्यंत लोकप्रिय हैं। राज्य भर में तारिणी के अनेक मंदिर हैं, जहाँ लोग यात्रा से पहले आशीर्वाद लेते हैं।
दोनों नाम मिलकर एक ही संदेश देते हैं: भक्त को भय, संकट और संसार-सागर से पार उतारना।
"शरणागतदीनार्तपरित्राणपरायणे। सर्वस्यार्तिहरे देवि नारायणि नमोऽस्तु ते॥"
देवी माहात्म्य (दुर्गा सप्तशती), अध्याय 11 — शरण में आए दीन-दुखियों की रक्षा में तत्पर, सबकी पीड़ा हरने वाली देवी नारायणी, तुम्हें नमस्कारबसु प्रहराज और दो रहस्यमयी बहनें
तारा तारिणी को "दो बहनें" क्यों कहा जाता है, इसका उत्तर मंदिर से जुड़ी सबसे प्रसिद्ध लोककथा में है। यह कथा अलग-अलग विवरणों में थोड़े अंतर के साथ सुनाई जाती है, पर उसका मूल रूप कुछ इस प्रकार है:
बहुत पहले इस क्षेत्र में बसु प्रहराज नाम के एक ब्राह्मण रहते थे, जो देवी के भक्त थे।
एक दिन उनके घर दो कन्याएँ आईं, या कथा के कुछ रूपों में उन्हें मार्ग में मिलीं, और वे उनके परिवार के साथ पुत्रियों की तरह रहने लगीं। उनके नाम थे तारा और तारिणी।
कुछ वर्षों बाद एक दिन दोनों बहनें अचानक लापता हो गईं। खोजते-खोजते पता चला कि वे पास की कुमारी पहाड़ी पर चढ़ गई थीं और वहीं अदृश्य हो गईं।
परंपरा के अनुसार उसी रात देवी ने स्वप्न में बसु प्रहराज को दर्शन दिए और बताया कि वे उनकी पुत्रियाँ नहीं, बल्कि आदिशक्ति के रूप तारा और तारिणी हैं।
देवी ने उन्हें पहाड़ी पर अपनी पूजा और मंदिर की देखरेख का आदेश दिया। तभी से यह पहाड़ी दो बहनों की पहाड़ी कहलाने लगी।
कई विवरण वर्तमान मंदिर के निर्माण या जीर्णोद्धार को सत्रहवीं सदी और इसी बसु प्रहराज से जोड़ते हैं, हालाँकि इस स्थान की पवित्रता को उससे बहुत पुराना माना जाता है। मंदिर के गर्भगृह में दो पत्थर-रूपी देवियाँ हैं जिनके चेहरे मानवाकार बनाए गए हैं, और उनके बीच दो पीतल के मुख रखे जाते हैं, जो उनकी चलंती प्रतिमा (उत्सव-विग्रह) माने जाते हैं।
कथा को कैसे पढ़ें: बसु प्रहराज और दो बहनों की कथा एक भक्ति-परंपरा है, जो पीढ़ियों से मौखिक रूप में चली आ रही है। इसे ऐतिहासिक दस्तावेज़ की तरह नहीं, बल्कि उस भाव की तरह पढ़ना चाहिए जिसमें भक्त देवी को अपने घर की बेटी या बहन के रूप में देखता है — शक्ति, जो दूर आकाश में नहीं, परिवार के बीच रहती है।
भारत में देवी को पारिवारिक संबंधों में देखने की यह परंपरा बहुत गहरी है। जैसे वैष्णो देवी में देवी तीन पिंडियों के रूप में पूजी जाती हैं और उन्हें सामूहिक रूप से "माता रानी" कहा जाता है, वैसे ही गंजाम में देवी दो बहनों के रूप में पूजी जाती हैं। दोनों तीर्थों में एक और समानता है: देवी तक पहुँचने के लिए पहाड़ी की चढ़ाई।
"कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति।"
आदि शंकराचार्य, देव्यपराधक्षमापन स्तोत्र — पुत्र कुपुत्र हो सकता है, पर माता कभी कुमाता नहीं होतीशक्तिपीठ और "स्तन पीठ": इस पहाड़ी का पौराणिक महत्व
तारा तारिणी मंदिर की दूसरी बड़ी पहचान है उसका शक्तिपीठ होना। शक्तिपीठों की कथा सब जानते हैं: दक्ष के यज्ञ में सती के आत्मदाह के बाद, जब शिव उनका शरीर लेकर ब्रह्मांड में विचरण करने लगे, तो भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से उस शरीर के अंग-अंग अलग कर दिए। जहाँ-जहाँ सती के अंग गिरे, वे स्थान शक्तिपीठ बने।
मंदिर की परंपरा के अनुसार कुमारी पहाड़ी पर सती के स्तन गिरे थे, और इसीलिए इसे "स्तन पीठ" कहा जाता है। स्तन मातृत्व, पोषण और करुणा का प्रतीक है — और यह अर्थ उस देवी से मेल खाता है जिसे लोग पालन करने वाली और रक्षा करने वाली माँ के रूप में देखते हैं। इस धाम को कल्याणी धाम भी कहा जाता है।
चार आदि शक्तिपीठों में से एक?
ओडिशा और पूर्वी भारत की एक परंपरा तारा तारिणी को चार आदि शक्तिपीठों में गिनती है। इस परंपरा के अनुसार चार प्रमुख आदि पीठ इस प्रकार हैं:
स्तन
चरण
योनि
दाहिने पैर की उँगलियाँ
यहाँ एक ईमानदार टिप्पणी ज़रूरी है: शक्तिपीठों की सूचियाँ अलग-अलग ग्रंथों में अलग हैं, और किस अंग का कौन-सा स्थान है, इस पर पूर्ण एकरूपता नहीं है। इसलिए "चार आदि शक्तिपीठ" वाली सूची एक प्रचलित क्षेत्रीय परंपरा है, सभी ग्रंथों द्वारा स्वीकृत सार्वभौमिक तथ्य नहीं। कुछ परंपराएँ इस पहाड़ी को तांत्रिक दृष्टि से महत्वपूर्ण "पूर्णगिरि" से भी जोड़ती हैं — यह भी एक मत ही है। शक्तिपीठों की विविध परंपराओं को विस्तार से समझने के लिए हमारी शक्तिपीठ श्रृंखला देखिए।
तंत्र, बौद्ध धर्म और लोक-आस्था का संगम
तारा तारिणी की पूजा में कई परंपराओं के रंग दिखाई देते हैं। तांत्रिक परंपरा में तारा दस महाविद्याओं में से एक हैं। दूसरी ओर, बौद्ध परंपरा में भी "तारा" एक अत्यंत पूज्य करुणामयी देवी हैं, जिन्हें विशेष रूप से यात्रियों और संकट में फँसे लोगों की रक्षिका माना जाता है। यह ध्यान देने योग्य है कि इस मंदिर के पास ही ऋषिकुल्या नदी के तट पर जौगड़ है, जहाँ सम्राट अशोक के प्रसिद्ध शिलालेख मिले हैं — यानी यह क्षेत्र प्राचीन काल से बौद्ध प्रभाव का भी साक्षी रहा।
कुछ विद्वान इसी आधार पर यह संभावना रखते हैं कि तारा तारिणी की उपासना में बौद्ध तारा-परंपरा, हिंदू तंत्र और स्थानीय लोक-देवी परंपरा का संगम हुआ होगा। यह एक विद्वत्तापूर्ण अनुमान है, निश्चित निष्कर्ष नहीं — पर यह ओडिशा की उस धार्मिक संस्कृति से पूरी तरह मेल खाता है जहाँ परंपराएँ एक-दूसरे में घुलती रही हैं। ओडिशा की शाक्त परंपरा की एक और अनोखी अभिव्यक्ति आप हीरापुर के छतविहीन चौसठ योगिनी मंदिर में देख सकते हैं।
तंत्र और पुराण
शक्तिपीठ की कथा, महाविद्या तारा, तांत्रिक पूजा-पद्धति और देवी माहात्म्य की परंपरा — यह धारा देवी को ब्रह्मांडीय शक्ति के रूप में देखती है।
बहनें और रक्षिका
बसु प्रहराज की कथा, "दो बहनें", मन्नतें, बच्चों के प्रथम मुंडन की प्रचलित परंपरा और नाविकों की प्रार्थना — यह धारा देवी को परिवार और गाँव की रक्षक माँ के रूप में देखती है।
तारा तारिणी मंदिर इन दोनों धाराओं का मिलन-बिंदु है — शायद यही उसकी सबसे बड़ी शक्ति है।
कलिंग के नाविकों से भारतीय नौसेना तक
पहाड़ी की ऊँचाई से जब आप पूर्व की ओर देखते हैं, तो समझ आता है कि यह क्षेत्र समुद्र से कितना जुड़ा है। प्राचीन कलिंग अपने समुद्री व्यापार के लिए प्रसिद्ध था। यहाँ के व्यापारी, जिन्हें ओडिशा में "साधव" कहा जाता है, बड़ी नौकाओं ("बोइत") में बाली, जावा, सुमात्रा और श्रीलंका तक व्यापार के लिए जाते थे। ओडिशा का प्रसिद्ध बाली यात्रा उत्सव आज भी उसी समुद्री स्मृति का उत्सव है।
परंपरा कहती है कि तारा तारिणी इन्हीं नाविकों और व्यापारियों की संरक्षक देवी थीं। लंबी, खतरनाक समुद्र-यात्रा पर निकलने से पहले वे देवी का आशीर्वाद लेते थे और सुरक्षित लौटने की मन्नत माँगते थे। "तारिणी" — पार उतारने वाली, और नौका — इस नाम का अर्थ यहाँ अपने पूरे रूप में खिल उठता है।
INSV तारिणी: जब देवी का नाम पृथ्वी की परिक्रमा पर निकला
यही प्राचीन स्मृति इक्कीसवीं सदी में एक अद्भुत रूप में लौटी। भारतीय नौसेना ने गोवा में बनी अपनी दूसरी समुद्री पाल-नौका को फ़रवरी 2017 में सेवा में शामिल किया और उसका नाम रखा INSV तारिणी — गंजाम की इसी तारा तारिणी पहाड़ी के मंदिर के नाम पर। नौसेना ने भी यही बताया कि यह देवी प्राचीन ओडिशा के नाविकों और व्यापारियों की संरक्षक मानी जाती थीं।
और फिर इतिहास बना। सितंबर 2017 में इस नौका पर सवार होकर भारतीय नौसेना की छह महिला अधिकारियों का दल "नाविका सागर परिक्रमा" पर निकला। लगभग 254 दिनों में उन्होंने लगभग 21,600 समुद्री मील की यात्रा की, चार महाद्वीपों और तीन महासागरों को पार किया, दो बार भूमध्य रेखा लाँघी, और मई 2018 में गोवा लौटीं। यह भारत की पहली सर्व-महिला दल द्वारा पृथ्वी की परिक्रमा थी। बाद में 2024–25 में इसी नौका पर दो महिला अधिकारियों ने नाविका सागर परिक्रमा-II के रूप में फिर से विश्व-परिक्रमा की।
सोचिए — एक पहाड़ी पर "दो बहनों" के रूप में पूजी जाने वाली देवी का नाम एक ऐसी नौका पर था, जिसे महिलाओं का दल पूरी पृथ्वी के चारों ओर ले गया। आस्था, इतिहास और आधुनिक नारी-शक्ति का ऐसा संगम बहुत कम देखने को मिलता है।
"केवल खड़े होकर पानी को निहारते रहने से तुम समुद्र पार नहीं कर सकते।"
रवींद्रनाथ टैगोर (प्रचलित कथन)| युग | तारिणी का रूप | किसकी रक्षा |
|---|---|---|
| प्राचीन कलिंग | नाविकों की संरक्षक देवी (परंपरा) | बोइत पर समुद्र-यात्रा करने वाले साधव व्यापारी |
| मध्यकाल | पहाड़ी पर दो बहनें, बसु प्रहराज की कथा | गाँव, परिवार और भक्तों की मन्नतें |
| आज | चैत्र मेले की आराध्या; शक्तिपीठ | लाखों श्रद्धालु, विशेषकर परिवार और बच्चे |
| 2017 से | INSV तारिणी नौका का नाम | नौसेना की महिला अधिकारियों की विश्व-परिक्रमा |
शिखर पर: दर्शन, चैत्र के मंगलवार और जीवित परंपराएँ
पहाड़ी की चोटी तक पहुँचने के दो रास्ते हैं। परंपरागत रास्ता है लगभग 999 पत्थर की सीढ़ियाँ, जिन्हें चढ़ना अपने आप में एक तपस्या माना जाता है। दूसरा रास्ता है रोपवे, जो कुछ ही मिनटों में भक्तों को ऊपर पहुँचा देता है, और अब पहाड़ी तक सड़क भी बनी है। बुज़ुर्गों और बच्चों के लिए रोपवे बड़ी सुविधा है, पर बहुत से श्रद्धालु आज भी पैदल चढ़ने को ही पूर्ण तीर्थ मानते हैं।
"उठो, जागो, और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाए।"
स्वामी विवेकानंद (कठोपनिषद् के "उत्तिष्ठत जाग्रत" से प्रेरित)चैत्र पर्व: मंगलवार का महामेला
तारा तारिणी का सबसे बड़ा उत्सव है चैत्र पर्व, जिसे चैत्र यात्रा या तारा तारिणी मेला भी कहते हैं। यह चैत्र मास (लगभग मार्च से अप्रैल) के हर मंगलवार को होता है, और इन दिनों पहाड़ी पर दक्षिण ओडिशा और आसपास के राज्यों से भारी संख्या में श्रद्धालु पहुँचते हैं। मंगलवार का संबंध भारतीय परंपरा में मंगल ग्रह और शक्ति-उपासना से जोड़ा जाता है — ग्रहों और वारों के इस संबंध पर हमारा लेख नवग्रह दरबार रोचक पाठ है।
इस मेले से जुड़ी एक प्रचलित परंपरा है बच्चों का प्रथम मुंडन। बहुत से परिवार मन्नत पूरी होने पर या शुभ संस्कार के रूप में बच्चों के पहले बाल देवी को अर्पित करते हैं। इसके अलावा डोल पर्व, दशहरा, नवरात्रि, दीपावली और संक्रांति भी यहाँ धूमधाम से मनाए जाते हैं। नवरात्रि और दुर्गा-पूजा की व्यापक परंपरा पर हमारी दुर्गा पूजा की संपूर्ण गाइड पढ़ें, और देवी के युद्ध-रूप की कथा दुर्गा बनाम महिषासुर में।
दर्शन का भाव
गर्भगृह में दोनों देवियाँ आभूषणों से सजी, चाँदी-सोने के मुकुट और वस्त्रों में दिखती हैं। भक्त एक साथ दोनों को प्रणाम करते हैं, क्योंकि मान्यता है कि दोनों एक ही आदिशक्ति के रूप हैं। दीपक और आरती के समय पूरा पहाड़ "जय माँ तारा तारिणी" के उद्घोष से गूँज उठता है। आरती के भाव को समझने के लिए हमारा लेख आरती में दीपक घुमाने का वास्तविक अर्थ एक सुंदर साथी पाठ है।
लोग यह भी पूछते हैं
तारा तारिणी मंदिर कहाँ है?
ओडिशा के गंजाम ज़िले में, पुरुषोत्तमपुर के पास, ऋषिकुल्या नदी के तट पर कुमारी पहाड़ी पर; ब्रह्मपुर से लगभग 28–30 किमी।
तारा तारिणी मंदिर में कितनी सीढ़ियाँ हैं?
पहाड़ी की चोटी तक लगभग 999 सीढ़ियाँ हैं। रोपवे और सड़क का विकल्प भी उपलब्ध है।
तारा तारिणी कौन-सा शक्तिपीठ है?
मंदिर परंपरा के अनुसार यहाँ सती के स्तन गिरे थे, इसलिए इसे स्तन पीठ कहा जाता है।
तारा तारिणी मेला कब लगता है?
चैत्र मास (लगभग मार्च–अप्रैल) के हर मंगलवार को चैत्र पर्व के रूप में बड़ा मेला लगता है।
INSV तारिणी का नाम किसके नाम पर रखा गया?
भारतीय नौसेना की इस पाल-नौका का नाम गंजाम के तारा तारिणी पहाड़ी मंदिर के नाम पर रखा गया है।
ब्रह्मपुर से तारा तारिणी कैसे पहुँचें?
ब्रह्मपुर से बस, टैक्सी या निजी वाहन से लगभग एक घंटे में पहाड़ी के नीचे पहुँचा जा सकता है।
पूरे ओडिशा में "माँ तारिणी": एक लोक-देवी का विस्तार
तारा तारिणी पहाड़ी को समझने के लिए ओडिशा में तारिणी-उपासना के व्यापक संसार को भी देखना चाहिए। ओडिशा में "माँ तारिणी" के अनेक मंदिर हैं, जिनमें केंदुझर ज़िले के घटगाँव का तारिणी मंदिर विशेष रूप से प्रसिद्ध है। राज्य में एक प्रचलित लोक-परंपरा यह भी है कि यात्री, विशेषकर वाहन-चालक, यात्रा शुरू करने से पहले माँ तारिणी के नाम पर नारियल अर्पित करते हैं या सड़क किनारे के छोटे तारिणी-स्थानों पर रुककर प्रणाम करते हैं। बहुत-से वाहनों पर "माँ तारिणी" लिखा भी दिखाई देता है।
यह परंपरा उसी प्राचीन भाव का आधुनिक रूप है जो कभी बोइत पर निकलने वाले साधवों के मन में था: यात्रा से पहले रक्षा की प्रार्थना। तब यात्रा समुद्र की थी, आज सड़क की है, पर भरोसा वही है। हर मंदिर की अपनी कथा और अपनी परंपरा है, इसलिए घटगाँव की तारिणी और गंजाम की तारा तारिणी को एक ही मंदिर समझने की भूल नहीं करनी चाहिए। फिर भी, दोनों मिलकर बताते हैं कि ओडिशा के जन-मन में "तारिणी" नाम कितनी गहराई से बसा है — एक ऐसी माँ के रूप में जो हर यात्री के साथ चलती है।
इस दृष्टि से गंजाम की पहाड़ी इस पूरी परंपरा का एक प्राचीन और शक्तिशाली केंद्र है, जहाँ तारिणी अकेली नहीं, बल्कि तारा के साथ, बहन के रूप में पूजी जाती हैं। यही जोड़ी इस तीर्थ को ओडिशा के अनेक तारिणी-स्थानों के बीच भी विशिष्ट बनाती है। देवी के नाम का जप इस परंपरा का सबसे सरल रूप है — नाम-स्मरण के महत्व पर हमारा लेख नाम जप को इतना शक्तिशाली क्यों माना गया इसी भाव को आगे बढ़ाता है।
दो बहनें हमें क्या सिखाती हैं?
अब जब हम चोटी पर हैं, तो लेख के शीर्षक वाले प्रश्न पर लौटें: कौन हैं तारा-तारिणी? इसका उत्तर एक वाक्य में देना हो, तो कहेंगे — वे आदिशक्ति के दो रूप हैं, जिन्हें भक्त बहनों के रूप में पूजते हैं, और जिनका नाम ही "पार उतारने" का वचन है। पर इस उत्तर के भीतर तीन गहरी सीख छिपी हैं।
पहली सीख: एकता द्वैत में भी रहती है। तारा और तारिणी दो हैं, पर भक्त उन्हें कभी अलग नहीं करता। सनातन दर्शन बार-बार यही कहता है कि एक ही सत्य अनेक रूपों में प्रकट होता है। दो बहनों की यह जोड़ी उसी सत्य का सबसे सरल, सबसे पारिवारिक रूप है।
दूसरी सीख: शक्ति पालन भी है और रक्षा भी। स्तन पीठ का प्रतीक पोषण का है, और तारिणी का नाम रक्षा का। माँ के ये दोनों रूप — खिलाने वाली और बचाने वाली — एक साथ यहाँ पूजे जाते हैं। यह हमें याद दिलाता है कि सच्ची शक्ति केवल लड़ने में नहीं, पालने में भी है।
तीसरी सीख: आस्था समय के साथ नए रूप लेती है। जो देवी कभी बोइत पर निकलने वाले व्यापारियों की रक्षा करती थीं, उनका नाम आज एक आधुनिक नौका पर है जिसे महिला अधिकारी दुनिया के चारों ओर ले गईं। परंपरा जड़ नहीं होती; वह हर युग में अपना नया अर्थ खोज लेती है।
भक्ति के अनेक मार्गों पर हमारा लेख भक्ति के नौ रूप यही बताता है कि हर भक्त देवी तक अपनी राह से पहुँचता है — कोई सीढ़ियाँ चढ़कर, कोई मुंडन की मन्नत से, और कोई समुद्र पार करने के साहस से। सनातन परंपरा के देवी-देवताओं के इस विशाल परिवार को समझने के लिए हमारी हिंदू देवी-देवताओं की संपूर्ण गाइड देखिए।
तारा तारिणी यात्रा गाइड
यात्रा से पहले नीचे दी गई जानकारी देख लें। समय, रोपवे का संचालन और मेले की व्यवस्थाएँ बदल सकती हैं, इसलिए स्थानीय स्तर पर पुष्टि अवश्य करें।
कुमारी पहाड़ी, पुरुषोत्तमपुर के पास, गंजाम ज़िला, ओडिशा; ऋषिकुल्या नदी तट
ब्रह्मपुर (बरहमपुर), लगभग 28–30 किमी
लगभग 160–170 किमी दक्षिण
ब्रह्मपुर रेलवे स्टेशन
बीजू पटनायक अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा, भुवनेश्वर
लगभग 999 सीढ़ियाँ; रोपवे और सड़क का विकल्प
अक्टूबर से मार्च सुहावना; चैत्र के मंगलवार सबसे विशेष, पर अत्यधिक भीड़
यात्रा के व्यावहारिक सुझाव
अगर आप सीढ़ियाँ चढ़ने का निश्चय करें, तो सुबह जल्दी शुरू करें, पानी साथ रखें, आरामदायक जूते पहनें, और बीच-बीच में विश्राम करें। चैत्र के मंगलवारों पर रोपवे और सीढ़ियों, दोनों पर लंबी कतारें हो सकती हैं, इसलिए धैर्य रखें और बच्चों व बुज़ुर्गों का विशेष ध्यान रखें। गर्भगृह में शांति और मर्यादा बनाए रखें, शालीन वस्त्र पहनें, और फ़ोटोग्राफ़ी के स्थानीय नियमों का पालन करें। चोटी से ऋषिकुल्या नदी और आसपास की हरियाली का दृश्य अद्भुत है — दर्शन के बाद कुछ समय वहाँ बैठकर उसे देखना न भूलें।
आसपास क्या देखें
पास में ही जौगड़ है, जहाँ सम्राट अशोक के ऐतिहासिक शिलालेख हैं — इतिहास-प्रेमियों के लिए अवश्य देखने योग्य। ऋषिकुल्या नदी का मुहाना ओलिव रिडले समुद्री कछुओं के सामूहिक अंडा-घोंसले के लिए जाना जाता है, जो मौसम के अनुसार (आमतौर पर वर्ष के आरंभिक महीनों में) देखा जा सकता है; इसके लिए वन विभाग के नियमों और समय की जानकारी पहले ले लें। ब्रह्मपुर अपने प्रसिद्ध "बरहमपुरी पट्ट" रेशम के लिए भी जाना जाता है, और गोपालपुर का समुद्र-तट भी यहाँ से ज़्यादा दूर नहीं।
तारिणी की नौका से प्रेरित: चुनी हुई वस्तुएँ
कलिंग की समुद्री स्मृति, गंजाम की कारीगरी, महाविद्याओं पर गहन पठन और पहाड़ी-यात्रा का साथी — इस लेख की कहानी से जुड़ा संग्रह।
पारंपरिक बोइत (कलिंग नौका) का हस्तनिर्मित मॉडल
प्राचीन कलिंग के साधव व्यापारियों की उस नौका का पीतल या लकड़ी का मॉडल, जिस पर वे बाली और जावा तक जाते थे। तारिणी की "पार उतारने वाली" परंपरा की सुंदर स्मृति।
Amazon पर देखेंबरहमपुरी पट्ट रेशमी दुपट्टा / साड़ी
ब्रह्मपुर की प्रसिद्ध रेशमी बुनाई, जिसकी पारंपरिक मंदिर-किनारी वाली डिज़ाइन दक्षिण ओडिशा की पहचान है। तारा तारिणी के क्षेत्र की अपनी कारीगरी, देवी-दर्शन या उत्सव के अवसर के लिए।
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हाथ से चित्रित गोलाकार ताश के पत्ते, जिनमें दशावतार और देव-कथाएँ अंकित होती हैं। ओडिशा की एक लुप्त होती कला का दुर्लभ और संग्रहणीय नमूना।
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तारा सहित दस महाविद्याओं के स्वरूप, प्रतीक और साधना-परंपरा पर प्रतिष्ठित अध्ययन। "तारा कौन हैं" प्रश्न को गहराई से समझने के लिए सबसे अच्छी पुस्तकों में से एक।
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देवी माहात्म्य का सुंदर अनुवाद, संस्कृत मूल और व्याख्या के साथ। इस लेख में उद्धृत "शरणागतदीनार्त..." जैसे श्लोकों को उनके पूरे संदर्भ में पढ़ने के लिए।
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999 सीढ़ियाँ हों या कोई और पहाड़ी तीर्थ — घुटनों पर दबाव कम करने वाली हल्की, मोड़कर बैग में रखी जा सकने वाली छड़ी। बुज़ुर्ग माता-पिता के साथ तीर्थ-यात्रा के लिए विशेष उपयोगी।
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उपसंहार: पार उतारने वाली दो बहनें
तो, कौन हैं तारा-तारिणी? वे गंजाम की कुमारी पहाड़ी पर विराजमान आदिशक्ति के दो रूप हैं, जिन्हें भक्त बहनों के रूप में पूजते हैं। लोककथा उन्हें बसु प्रहराज के घर आई दो रहस्यमयी कन्याएँ बताती है। शक्तिपीठ की परंपरा इस पहाड़ी को सती के स्तन गिरने का स्थान, यानी स्तन पीठ मानती है। तंत्र उन्हें महाविद्या तारा से जोड़ता है, और इतिहास इस क्षेत्र में बौद्ध प्रभाव की भी झलक देता है। और समुद्र की स्मृति उन्हें कलिंग के नाविकों की रक्षिका बनाती है — वह स्मृति जो INSV तारिणी के रूप में पूरी पृथ्वी की परिक्रमा कर आई।
इन सब परतों के बीच एक बात स्थिर है: उनका नाम ही उनका वचन है। तारा और तारिणी — दोनों का अर्थ है पार उतारना। चाहे वह नदी हो, समुद्र हो, जीवन का कोई संकट हो या संसार-सागर, भक्त उनसे यही प्रार्थना करता है कि वे उसे पार ले जाएँ।
अगली बार जब आप ओडिशा जाएँ, तो पुरी और कोणार्क के साथ दक्षिण की ओर इस पहाड़ी तक भी आइए। 999 सीढ़ियाँ चढ़िए, या रोपवे से ऊपर पहुँचिए, और चोटी पर खड़े होकर नीचे बहती ऋषिकुल्या को देखिए। उस क्षण आप समझ जाएँगे कि सदियों से यात्री, नाविक और माताएँ इस पहाड़ी की ओर क्यों देखते आए हैं।
देवी-परंपरा की और कहानियाँ
Moonlit Sanatan पर शक्तिपीठों, मंदिरों और सनातन विरासत की शोधपूर्ण कहानियाँ। हमारी मंदिर श्रृंखला भी देखिए।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
तारा तारिणी मंदिर कहाँ स्थित है?
तारा तारिणी मंदिर ओडिशा के गंजाम ज़िले में पुरुषोत्तमपुर के पास, ऋषिकुल्या नदी के तट पर कुमारी पहाड़ी की चोटी पर स्थित है। यह ब्रह्मपुर (बरहमपुर) से लगभग 28–30 किलोमीटर दूर है।
तारा और तारिणी कौन हैं?
तारा और तारिणी आदिशक्ति के दो रूप हैं, जिन्हें भक्त दो बहनों के रूप में पूजते हैं। दोनों नामों का अर्थ है "पार उतारने वाली"। तांत्रिक परंपरा तारा को दस महाविद्याओं में से एक मानती है, जबकि लोक-आस्था में तारिणी संकट और यात्रा में रक्षा करने वाली माँ हैं।
तारा तारिणी को दो बहनें क्यों कहा जाता है?
लोककथा के अनुसार दो कन्याएँ, तारा और तारिणी, बसु प्रहराज नाम के एक ब्राह्मण के घर बेटियों की तरह रहीं और एक दिन कुमारी पहाड़ी पर अदृश्य हो गईं। बाद में स्वप्न में उन्होंने बताया कि वे आदिशक्ति के रूप हैं। इसी कथा के कारण उन्हें दो बहनें कहा जाता है।
क्या तारा तारिणी शक्तिपीठ है?
हाँ, मंदिर परंपरा के अनुसार यहाँ सती के स्तन गिरे थे, इसलिए इसे स्तन पीठ कहा जाता है। एक क्षेत्रीय परंपरा इसे कामाख्या, विमला और कालीघाट के साथ चार आदि शक्तिपीठों में गिनती है, हालाँकि शक्तिपीठों की सूचियाँ ग्रंथों में अलग-अलग हैं।
तारा तारिणी मंदिर में कितनी सीढ़ियाँ हैं?
पहाड़ी की चोटी तक लगभग 999 सीढ़ियाँ हैं। जो पैदल नहीं चढ़ सकते, उनके लिए रोपवे और सड़क का विकल्प भी उपलब्ध है।
तारा तारिणी का चैत्र मेला कब होता है?
चैत्र पर्व या तारा तारिणी मेला चैत्र मास (लगभग मार्च–अप्रैल) के हर मंगलवार को होता है, जब भारी संख्या में श्रद्धालु दर्शन के लिए आते हैं। इस दौरान बच्चों के प्रथम मुंडन की परंपरा भी प्रचलित है।
INSV तारिणी का तारा तारिणी मंदिर से क्या संबंध है?
भारतीय नौसेना ने 2017 में अपनी पाल-नौका का नाम INSV तारिणी, गंजाम के तारा तारिणी पहाड़ी मंदिर के नाम पर रखा, क्योंकि यह देवी प्राचीन ओडिशा के नाविकों और व्यापारियों की संरक्षक मानी जाती हैं। इसी नौका पर नौसेना की महिला अधिकारियों ने नाविका सागर परिक्रमा के तहत पृथ्वी की परिक्रमा की।
तारा तारिणी मंदिर कैसे पहुँचें?
निकटतम रेलवे स्टेशन ब्रह्मपुर है और निकटतम हवाई अड्डा भुवनेश्वर। ब्रह्मपुर से बस, टैक्सी या निजी वाहन से पहाड़ी के नीचे तक पहुँचकर सीढ़ियों या रोपवे से मंदिर तक जाया जा सकता है।
